राष्ट्रीय स्तर पर अंतर्राज्जीय विवाह पर संगोष्ठी
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विश्णचरण गुप्ता शा.महाविद्यालय पुसौर में वृहद सेमीनार

स्थानीय नगर पंचायत पुसौर के मंगलभवन में राष्ट््रीय स्तर पर ”भारतीय समाज में अंतर्जातीय विवाह का औचित्य-एक वैज्ञानिक दृष्टीकोण” के विषय को लेकर आये हुये शिक्षाविद् एवं विभागाघ्यक्षों द्वारा अपना अपना मंतव्य प्रस्तुत किया। जिस तरह प्राचीन काल में ऋषिमुनी संत महात्माओं ने समय समय पर समाज को नई दिशा दी, सामाजिक कुरीतियो का विरोध किया और आवश्यकतानुसार सामाजिक सुधार के रास्ते सुझाये वही काम महाविद्यालयीन शिक्षा जगत के पुरोधाओं द्वारा किया जाना लाजिमी है इसी कडी में उपरोक्त भव्य एवं गरीमामयी गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें विभीन्न प्रांतो से आये विषयों के डॉक्टर, प्रोफेसर व विभिन्न विषयों के विद्वान एवं समाज शास्त्रियों ने अंतर्जातीय विवाह के वैज्ञानिक पहलुओं पर सारगर्भित आख्यान दिया। उक्त कार्यक्रम को मुर्तरूप देने में प्राचार्य एवं संरक्षक डॉ एस एल सोनवाने, डॉ. सरोज कुमार डॉ. रोहिणी आर्या एवं उनके टीम के व्यवस्था में आयोजित उक्त कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. के.एल टाण्डेकर, विशिष्ट अतिथियों में डॉ. अतुल श्रीवास्तव, डॉ. पवन अग्रवाल, डॉ. अंजनी तिवारी, डॉ. आर.के. तम्बोली, डौ. तथा केसी कुछवाहा रहे । विषय विशेषज्ञों में डॉ. मेदिनी नायक, डॉ. मीना श्रीवास्तव ग्वालियर, डॉ. प्यारेलाल आदिले कोरबा, डॉ. अरविंद कुमार जगदीव बिर्रा, मानव समाज विभाग प्रमुख सुबोध देव, प्रोफेसर अजय कुमार बघेल हसौद, आयोजक मण्डल के जनभागीदारी अध्यक्ष धनमती गुप्ता, सदस्य खगेश्वर पटेल, प्रो. विजय कांटे, प्रो. रमेश साहू, प्रो. जगनारायण नायक, प्रो. हरिहर चौहान, डॉ. सावित्री अग्रवाल, प्रो. गरिमा जोशी, प्रो. अंतिमा प्रधान, सी आर अनंत, डी डी यादव, आरमा एक्क, बी पटेल, सहित अन्य लोग उपस्थित रहे । आगंतुक अतिथियों में जिले के पर्यावरण विद् व वरिष्ठ पत्रकार शिव राजपुत, हरित सेवा समिति अध्यक्ष सीताराम चौहान, पूर्व जनपद सदस्य दधिबामन साव, सेवा सहकारी समिति अध्यक्ष घनश्याम पटेल, सहित अन्य गणमान्य जन उपस्थित रहे। समुचे कार्यक्रम का मुख्य अंश यह है कि विवाह में दो परिवार को जोडने के साथ साथ इन परिवारों से जुडे अन्य लोग भी जुडते हैं इस आशय से वैवाहिक संबंध वहीं स्थापित होना चाहिये जहां संपूर्ण सहमति रहे। इन सहमतियों में वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक सहित अन्य दृष्टियां लगाई जा सकती है इन सभी में परिवार व समाज के लोगों की सहमति आवश्यक होती है चूंकि यदि किये गये वैवाहिक संबंध में कही भी खटास उत्पन्न होता है तो यही परिवार व समाज के लोग ही काम आते हैं जिसे कहा जाता है खुन ही खुन को पहचानता है ।
उल्लेखनीय है कि अंतर्जातीय विवाह जितने भी आज तक हुये है उसमें से लगभग 3 प्रतिशत ही शांति व खुशहाली से जीवन यापन कर रहे हैं ऐसा नहीं कहा जा सका है चूंकि ये अपने चार दिवारी में तो खुश रहते हैं लेकिन बाहर दबे व छुपे छुपे से रहते हैं। पुराणों के मुताविक इन्हें सामाजिक मान्यता नहीं है वहीं शासन द्वारा इस तरह के विवाह को प्राथमिकता दिया जाकर पुरस्कृत करने की बात कहीं जाती है लेकिन पिछले 30 वर्ष से ेअब तक शासन द्वारा किसी भी अंतर्जातीय विवाह किये हुये जोडे को अब तक कोई पुरस्कार नहीं मिला है इस आधार पर शासन केवल दस्तावेजों में ही यह तथ्य अवगत करा रही है कि अंतर्जातीय विवाह कर सकते हैं लेकिन व्यवहार में इसकी स्वीकृति शासन द्वारा भी नहीं है।

News Reporter

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