एक साल बाद फिर याद आईं लोगों को केलो मैय्या
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जीवनदायिनी केलो को आज भी अपने उद्धारक का इंतजार

शहर तथा रायगढ़ जिले की जीवनदायी कही जाने वाली केलो नदी की महाआरती एक बार फिर चर्चा में है। छत्तीसगढ़ सामाजिक मंच व केलो उद्धार समिति ने दूसरी बार केलो मैय्या की आरती का बीडा उठाया है और इस महाआरती के लिए पिछले कुछ दिनों से जोर शोर से तैयारी चल रही है। मगर इस महाआरती के बीच एक बात खटकने वाली है कि इन कथित सामाजिक और उद्धारक समितियों ने करीब साल भर पहले इसी तरह महाआरती का आगाज किया था और उस समय केलो को प्रदूषण मुक्त करने के लिए बडे-बडे दावे और संकल्प किए गए थे। मगर बीते एक साल में इन समितियों की संकल्प की एक भी बानगी देखने को नही मिली। सिवाए इस समिति के बीच विवाद के।
रायगढ़ शहर और जिले की पेयजल तथा पानी से संबंधित सभी समस्याओं का निदान करते -करते केलो नदी पिछले कुछ दशकों के दौरान इतनी मैली हो चुकी है कि अब इस नदी में खासकर शहरी क्षेत्र में या तो गंदा व मैटमैला पानी ही बहता नजर आता है या फिर कल-कल बहती केलो अब संकरे नाले में तब्दील होती दिख रही है। ऐसा नही है कि शहर तथा जिले की इस जीवनदायिनी केलो को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कभी प्रयास नही हुए। लेकिन विडंबना ही है कि कभी केलो को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सफल प्रयास आज तक नही हो सका। दरअसल केलो नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए दो प्रमुख बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। पहली तो यह कि इस नदी में पिछले कुछ वर्षो से उद्योगों के द्वारा चोरी छिपे उड़ेले जा रहे केमिकल युक्त गंदे पानी के प्रवाह पर कारगर रोक लगाई जाए और दूसरी यह कि शहरी क्षेत्र में केलो को गंदगी और केलो में डाले जाने वाले कचरे से मुक्त करने के लिए कोई कारगर योजना अमल में लाई जाए। जिस दिन इन दोनों विषयों पर कारगर पहल हो जाएगी उस दिन से केलो की सफाई का वास्तविक अभियान शुरू हो सकेगा। हालांकि इससे पहले केलो को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कुछ उद्योगों पर प्रशासन ने नकेल कसते हुए कार्रवाई भी की है। इसी तरह शहर के भीतर कयाघाट से लेकर बोंदाटिकरा तक रिटेनिंग वॉल के बगल से नाली बनाने का प्रस्ताव भी नगर निगम के द्वारा भेजा गया था, किंतु यह योजना किन कारणों से ठंडे बस्ते में चली गई यह समझ से परे है। इसी तरह केलो को साफ-सुथरा रखने के लिए वाटर ट्रिटमेंट प्लांट भी जितनी जल्दी लगे उतना अच्छा होगा।
जहां तक पिछले साल और इस वर्ष हो रहे केलो की महाआरती की बात है तो आयोजन समिति इसके लिए साधुवाद के पात्र है किंतु इस कार्यक्रम के पीछे दरअसल राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई और श्रेय लेने की होड अधिक दिखाई देती है। वर्ना कोई कारण नही है कि किसी माता की आरती के लिए उनके बेटे आपस में भिड जाएं और श्रेय लेने की जुगत में विवाद करने लगे। गौरतलब रहे कि गत वर्ष इसी तरह आयोजन समिति ने केलो महाआरती का बीडा उठाया था और उस दौरान आयोजन समिति के पदाधिकारियों ने केलो को प्रदूषण मुक्त करने और मरीन ड्राईव की तर्ज पर शहरी क्षेत्र में सौंदर्यीकरण कराने के लिए पहल करने की बात कही थी। मगर आरती होने के बाद समिति के ये लोग जैसे पिछले साल भर से सोते रहे। इस दौरान केलो को प्रदूषण मुक्त करने के लिए इन कथित उद्धारक व सामाजिक समितियों ने तिनका तक नही उठाया। हमारा मानना है कि इससे तो भले वे लोग हैं जो प्रतिदिन यहां नहाने आने के दौरान नदी में आसपास फैले कचरे को साफ कर जाते हैं। जहां तक केलो की सफाई का सवाल है तो कई दशक पहले केलो केसपूत शिव राजपूत ने केलो के उद्गम से लेकर महानदी में विसर्जन तक के क्षेत्र की न केवल पद यात्रा की थी बल्कि इसको प्रदूषण मुक्त करने के लिए अपनी किताब में सुझाव भी दिए थे। जिन पर अमल करने की जरूरत है। जिला प्रशासन और उपरोक्त समितियां मिलकर इस तरह का बीडा उठा सकती हैं वर्ना इस सामाजिकता के अभाव में केवल साल भर में एक बार एक दिन मकर संक्रांति को केलो मैय्या की आरती या महाआरती करके केलो मैय्या के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेना उनका सम्मान नही अपमान करने की तरह है। देखा जाए तो वर्तमान परिदृश्य में राजकपूर की एक पुरानी फिल्म राम तेरी गंगा मैली की तर्ज पर रायगढ़ की केलो मैय्या भी मैली और मैली होती गई है। जिसे अब भी अपने किसी राम का इंतजार है। सवाल यह है कि वह राम कौन है आप या हम।

News Reporter

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