इतनी महंगी फीस में कैसे पढ़ेगा इण्डिया व कैसे बढ़ेगा इण्डिया
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वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ में निजी स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। निजी स्कूल संचालक इसकी आड़ में वार्षिक शिक्षण शुल्क के रूप में अनाप शनाप वसूली कर रहे हैं। अधिकांश स्कूल संचालक दोनों राजनैतिक पार्टियों के पदाधिकारी व कार्यकर्ता से जुड़े हैं जिसके कारण शिक्षा विभाग भी इनकी मनमानी पर विराम नही लगा पा रहा है वहीं राजनैतिक दबाव के कारण ये स्कूल संचालक मान्यता ले लेते हैं और अपने इस व्यवसाय को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रतिवर्ष बच्चों से वार्षिक शिक्षण शुल्क के अलावा बाल दिवस, शिक्षक दिवस, आनन्द मेला , वार्षिकोत्सव ,ड्रेस, स्टेशनरी आदि के नाम पर वसूली की जाती है | शिक्षा विभाग की लापरवाही व निजी स्कूल संचालकों की मनमानी का खामियाजा बच्चे व पालक भुगत रहे हैं तो दूसरी ओर शासकीय स्कूलों का स्तर दिन प्रतिदिन गिरते जा रहा है | विगत 19 वर्षों में दोनों पार्टीयों की सरकार ने वार्षिक शिक्षण शुल्क में नियन्त्रण रखने के लिये फीस नियामक आयोग का गठन तक नही कर पाया, क्यों कि अधिकांश स्कूल संचालक दोनों पार्टियों से सम्बन्ध रखते हैं।मान्यता संबंधी मापदण्डों का पालन न होने के बावजूद निजी स्कूल संचालक राजनैतिक दबाव व चन्द रुपयों की आड़ में मान्यता ले लेते हैं।शिक्षा का अधिकार अधिनियम की भी धज्जियां उड़ा दी गई। आरटीई के रिक्त सीटों के बावजूद बच्चों को प्रवेश तक नही दिला सका शिक्षा विभाग | निजी स्कूल संचालकों की मनमानी पर विराम लगाने ,आरटीई के तहत गरीब बच्चों को प्रवेश दिलाने संबंधी कई प्रकरण माननीय उच्च न्यायालय छतीसगढ में लंबित है|अब देखना यह है कि आखिर कब तक तारीख पे तारीख का सिलसिला चलता है और कब इस दिशा में कोई ठोस निर्णय व आदेश होता है।.

News Reporter

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