World Tribal Day celebrated in Pusaur with many discussions,
देष में ही नहीं बल्कि समुचे विष्व में आदिवासी लोगों को उपर उठाने की नियत से संयुक्त राश्ट््र महासभा द्वारा 1994 में इसकी षुरूआत की गई तब से लेकर अब तक देष में 9 अगस्त को आदिवासी दिवस मनाया जाता रहा है। किसी वर्ग विषेश को चिन्हांकित करते हुये उसके लिये एक दिवस निर्धारित करना इस बात का प्रमाण है कि वह समुदाय को सामान्य जन जीवन के तर्ज पर उपर उठाना है। सरकार इसमें अपनी नितियों में भी तब्दीली भी लाई है जिसमें आदिवासी समुदाय जितने उपर उठ रहे हैं उसी क्रम में कई आदिवासी समाज के लोग सरकारी तंत्र में निर्दोश होते हुये भी फंस रहे हैं और कहीं कहीं तो उनके सरल स्वभाव के कारण उनके जमीन जायदाद में भी सेंध लगाया जाने की पुश्टी की जाती रही हैं। बस स्टैंण्ड पुसौर में हरित सेवा समिति अध्यक्ष सीताराम चैहान के अगुवाई में विष्व आदिवासी दिवस कार्यक्रम के आयोजन में वरिश्ठ स्वतंत्र पत्रकार एवं पर्यावरण विद षिव राजपुत के साथ ही समाज एवं पर्यावरण विकास से जुडे पद्मनाभ प्रधान, प्रेम गुप्ता, नरेन्द्र नायक सहित आदिवासी समाज के अन्य पदाधिकारी षामिल रहे। जिनके बिच उक्त कार्यक्रम को सम्पन्न करने के बाद यह चर्चा का विशय रहा कि किस तरह आदिवासियों के भोलेपन का फायदा उठाकर सरकारी तंत्र के लोग अपने हित साधन को प्राथमिकता में लेकर उन्हें फंसाते हैं जिसमें सरकार के लोग इनके जहां पीठ थपथपाते हैं वहीं विभाग इन्हें इनके कर्मठ और इमानदार व्यक्तित्व को लेकर ‘‘राजा हरिष्चंद‘‘ की तमगा भी देती रही है। यह वाकिया ग्राम पंचायत कांदागढ के पुर्व सरपंच सोमती सिदार के साथ हुये घटनाक्रम है जिसमें एकाएक सघन जांच, एफ आई आर और सीधा जेल दाखिल को लेकर है। बताया जाता है कि सोमती सिदार एक आदिवासी नेतृ हैं जो पर्यावरण व महिला सुरक्षा के साथ ही अपने समाज के लोगों को उपर उठाने सदैव तैनात रहती है। ये 2015 से 20 तक कांदागढ पंचायत में सरपंच रही जो अपने उक्त कार्यकाल में अविष्वास प्रस्ताव की षिकार होकर पद से पृथक हुईं और चुनाव होने पर ये फिर से भारी मतों से सरपंच बन कर अपनी कार्यकाल पुरा किया। इस बीच राषन वितरण का कार्य सचिव कृश्णचंद कर्श द्वारा किया जाता था जिसका सारा हिसाब किताब वही रखता था जिसे तात्कालीन सरपंच सोमती सिदार सहित अन्य पंचायत पदाधिकारी बखुबी जानते थे। सचिव बिमार होने के बाद कुछ माह बाद उसका मृत्यु हो गया। इसके पुर्व खाद्य विभाग द्वारा किये गये जांच में सरपंच सहित सारे पंचायत पदाधिकारी खाद्य अधिकारी के समक्ष मौखिक रूप से हिसाब कर लिया गया था जो सचिव के मृत्यु के बाद संबंधित दस्तावेज के संधारण आदि नहीं होना बताया जाता है लेकिन तात्कालीन खाद्य अधिकारी जांच को पुर्ण करते हुये मामले को रफा दफा कर दिया गया था और यह मामला एकाएक 6 साल बाद जीन की तरह बाहर आई विभाग द्वारा कार्यवाही की गई जिसमें सोमती सिदार को जेल दाखिल होना पडा जो कि कुछ ही दिन पहले अपने पति को खो चुके थे और उनके दो बच्चे जो केवल स्कुल और कालेज के अभ्यस्त हैं उन्हें वकील और न्यायालय का सामना करना पडा और किसी तरह अपने मां को जेल से बाहर निकालने में सफल हुये। आदिवासी समाज के अध्यक्ष भवानी सिदार सहित मंचस्त लोगों ने सोमती सिदार के साथ हुये इस अप्रत्याषित घटना का कडी निन्दा किया। वहीं वरिश्ठ पत्रकार षिव राजपुत ने कहा कि एक आदिवासी महिला जो कुछ दिन से वैधव्यता झेल रही है अपने बच्चे और घर सम्हाल रही है इसी बिच खाद्य विभाग के अधिकारियों का एफ आई आर कर उसे जेल दाखिल कराना षासन के नियम में तो षायद नहीं है चूंकि जांच किया जाकर उसकी क्षतिपुर्ति भी की जा सकती थी। सोमती सिदार के सरपंची कार्यकाल में विभाग को फुर्सत नहीं हुई, इसके बाद के 5 साल कार्यकाल में भी फुर्सत नहीं हुई और जब वह पति के न रहने के स्थिति में अपने घर व बच्चों को सम्हाल रही थी ऐसे स्थिति में कार्यवाही करना कहीं न कहीं विभाग पुर्वाग्रह में रही या वह किसी को बचा कर अपने ड्युटी पुरी कर षासन के लोगों से अपने निश्पक्ष जांच का प्रमाण लेना चाहती है। ज्ञात हो कि उक्त घटना के कारण ही आदिवासी दिवस पर कोई रंगारंग कार्यक्रम नहीं हुआ और नहीं कोई उत्साह रहा जबकि इसके पुर्व समुचे जिले स्तर में यह कार्यक्रम होता रहा है।



