तहसील मुख्यालय पुसौर में लगभग 200 वर्शो से चली आ रही रामलीला मंचन की क्ष्याति पुसौर के आसपास के साथ प्रदेष स्तर में तो है ही वहीं इसकी क्ष्याति उडीसा भी पहुंच चुकी है जिसके एवज में रामलीला प्रबंधन को सम्मानित किया गया है। जानकारी के मुताविक उडीसा सरकार ने जहां भी उडीया भाशा से जुडे कार्यक्रम लंबे समय तक संचालित है उसके लिये उसे सम्मान करने की बीडा पिछले कई वर्शो से उठाया है इसी कडी में बिते दिनांक को राश्ट््रीय गोलोक बिहारी धल भाशा कान्क्लेव, गोपबंधु टाउन ढेंकानाल उडीसा से 21 फरवरी अन्तर्राश्ट््रीय मातृभाशा दिवस में षामिल होकर एवार्ड प्राप्त करने के लिये रामलीला समिति पुसौर को निमंत्रित किया गया जिसमें रामलीला समिति अध्यक्ष बैंकुण्ठ गुप्ता, रामलीला के गायक सुरेष महाणा, संयोजक उमेष साव इसमे षामिल हुये। उक्ताषय को लेकर बैंकुण्ठ गुप्ता ने बताया कि यह आयोजन विश्व ओडीसा गोलोक बिहारी धल स्मृति संसद भुवनेष्वर के बेनर तले संपन्न हुआ इसी कडी में इन्हौने बताया कि गोलोक बिहारी धल विष्व विख्यात भाशा विज्ञानी, ध्वनितत्व वेत्ता, ओडिया साहित्य रत्न थे जिनके स्मृति मे उडीसा सरकार यह आयोजन की जिसमे वहां के रेवेंषा कालेज विष्वविद्यालय के गवेशक, प्रध्यापक गण, भाशा अधिकार कर्मी गण, अन्य भाशा प्रेमी तथा छात्र छात्रा गण उपस्थित रहे जो स्त्रोतस्विनी कविता पाठ के साथ कई तरह के लोकरंजन व हृदयस्पर्षी साहित्य को अवगत कराया। पाठकों ने बताया कि ध्वनि विज्ञान के जनक गोलक बिहारी धल्ल ओडीसा में भाशाई विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी थे और उनकी पुस्तकें अभी भी ओडिषा के विष्व विद्यालयों में अनुषंसित पुस्तक सूचि में है। वे एक उत्साही अनुवादक भी थे और उन्हौने प्रेमचंद्र के गोदान का उडीया में अनुवाद भी किया है। उक्त कार्यक्रम को लेकर उमेष साव ने बताया कि छत्तीसगढ में भुपेष सरकार द्वारा आयोजित रामलीला कार्यक्रम में पुसौर के रामलीला को उचित स्थान नहीं मिला लेकिन उडीसा सरकार ने हमारे रामलीला की सराहना ही नहीं बल्कि निमंत्रण कर सम्मान किया है। उल्लेखनीय है कि पुसौर में रामलीला कब से हो रहा है इसका ठीक ठीक जानकारी किसी के पास नहीं हैं चूंकि बिते 3 पिढि के लोगों से पुछताछ करने पर उन्हौने भी सटिक जानकारी नहीं दे पाये हैं। अब तक के 200 सालों में जिन्हौने भी रामलीला मंचन में सहभागिता निभाया है उन सब के प्रति आभार जताते हुये रामलीला गायक व राम का रोल अदा करने वाले सुरेष महाणा ने बताया कि उन्हीं के लगातार रामलीला मंचन करने से ही यह उपलब्धि हासिल हुई है उन्हें हम कभी नहीं भुलेंगे और उनके पद चिन्हों पर ही चलते रहेंगे।



