प्रतिदिन 8 से 9 हजार रुपये तक की बिक्री
रायगढ़, मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है। शासन की मंशा के अनुरूप राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार और आजीविका के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसका सकारात्मक उदाहरण रायगढ़ जिले में देखने को मिल रहा है, जहां दीपावली के अवसर पर स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं मिट्टी के आकर्षक दीये तैयार कर अपनी आय बढ़ाने में जुटी हैं। इन दीयों से जहां लोगों के घर-आंगन रोशन होंगे, वहीं महिलाओं को भी अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल रहा है।
रायगढ़ जिले के सात जनपदों के 125 स्व-सहायता समूहों से जुड़ी लगभग 400 महिलाएं दीपावली के लिए दीया निर्माण में जुटी हुई हैं। महिलाएं पारंपरिक मिट्टी के दीयों के साथ आधुनिक पसंद को ध्यान में रखते हुए विभिन्न आकार और रंगों के आकर्षक दीये तैयार कर रही हैं। अपने हुनर और रचनात्मकता से ये महिलाएं पारंपरिक कला को नया स्वरूप देने के साथ परिवार की आमदनी बढ़ाने में भी योगदान दे रही हैं। जिले की कुम्हार बहुल ग्राम पंचायतों में दीया निर्माण की यह पहल विशेष रूप से देखने को मिल रही है। खरसिया जनपद के मुरा, पुसौर जनपद के टपरदा, बरपाली और घुघुआ, घरघोड़ा जनपद के रुमकेरा, घरघोड़ी और पोरड़ा तथा धरमजयगढ़ जनपद के कापू और दुर्गापुर सहित विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं इस कार्य में सक्रिय हैं। इस पहल से पारंपरिक मिट्टी कला को संरक्षण मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।
सी-मार्ट बना ग्रामीण महिलाओं के उत्पादों की बिक्री का मजबूत माध्यम
महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने में जिला पंचायत रायगढ़ द्वारा संचालित सी-मार्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सी-मार्ट के माध्यम से स्व-सहायता समूहों के उत्पादों को शहर के संगठित बाजार में स्थान मिल रहा है। इससे महिलाओं को अपने उत्पादों की बिक्री के लिए बेहतर मंच मिला है और वे सीधे बाजार से जुड़कर अपनी मेहनत का लाभ प्राप्त कर रही हैं। दीपावली के त्योहार में मिट्टी के आकर्षक दीयों की मांग बढ़ने से महिलाओं को अच्छी आमदनी हो रही है। सी-मार्ट और स्थानीय बाजारों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 8 से 9 हजार रुपये तक के दीयों की बिक्री हो रही है। इस पहल से महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ने के साथ उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनने का अवसर मिल रहा है। स्व-सहायता समूहों की ये महिलाएं अपने हुनर और मेहनत से न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि स्थानीय परंपरा और मिट्टी की कला को भी आगे बढ़ा रही हैं।


