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जनजातीय धरोहरों को संरक्षित करने की दिशा में मुख्यमंत्री ने की अच्छी पहल- सिरहा श्री कुमेटी

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Chief Minister took a good initiative towards preserving tribal heritage- Sirha Shri Kumeti

बैगा, गुनिया, सिरहा को 5-5 हजार रूपए की सम्मान निधि देने के निर्णय से खुशी का माहौल

Ro.No - 13672/156

उत्तर बस्तर कांकेर, 02 दिसम्बर 2024/ मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने बस्तर प्राधिकरण की बैठक में जनजातीय परंपराओं और विरासतों को सहेजने व संजोने के उद्देश्य से बैगा, गुनिया और सिरहा को हर साल 5-5 हजार रूपए की सम्मान निधि प्रदाय करने का फैसला लिया था। राज्य सरकार के इस निर्णय से जनजातीय परंपराओं के संरक्षकों में हर्ष व्याप्त है।

नरहरपुर विकासखण्ड के ग्राम मुड़पार (दखनी) के सिरहा श्री अमर सिंह कुमेटी ने बताया कि इस फैसले से एक तरह से बस्तर की जनजातीय धरोहरों को आगे बढ़ाने वालों ने खुशी व्याप्त है। उन्होंने बताया कि पिछले 24 साल से सिरहा का काम कर रहे हैं तथा नाड़ी वैद्य के रूप में ग्रामीणों सहित अन्य क्षेत्रों से आए लोगों की शारीरिक एवं मानसिक बाधाओं को दूर करने का प्रयास करते हैं। श्री कुमेटी ने बताया कि इसके तहत् दैवीय शक्तियों- बूढ़ीमाता, रकतमावली, रानीमाई, गाजवाली का आह्वान कर लोगों की बाधाएं दूर करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि किसी तरह की शारीरिक व्याधि का पता चलने पर रोगी को तत्काल अस्पताल जाने की सलाह दी जाती है। सिरहा श्री कुमेटी ने बताया कि वह परमाहा मुदिया (कुल परम्परा) के अनुचर हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री की इस घोषणा के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस राशि से जनजातीय परम्पराओं को आगे बढ़ाने का जरिया मिलेगा। इसी गांव के युवा सिरहा श्री गोविन्दराम वट्टी ने बताया कि वह ‘पाण्डेलइया’ परम्परा के अनुगामी हैं और बूढ़ीमाता, गढ़मावली, काली कंकालिन माता का आह्वान कर लोगों के कष्ट दूर करने का काम करते हैं। पिछले 15 सालों से सिरहा का काम करने वाले श्री वट्टी ने बताया कि वह नाड़ी ़परीक्षण कर, पीढ़ा बैठाकर ‘बिचारने’ का काम करते हैं। श्री वट्टी ने भी मुख्यमंत्री श्री साय की इस घोषणा पर हर्ष व्यक्त करते हुए उनका आभार माना।

उल्लेखनीय है कि 18 नवम्बर को चित्रकोट (बस्तर) में आयोजित बस्तर विकास प्राधिकरण की बैठक में जनजातीय परम्पराओं के संरक्षक बैगा, गुनिया और सिरहा को प्रोत्साहन स्वरूप 5-5 हजार रूपए की सम्मान निधि देने की घोषणा की। राज्य सरकार के इस निर्णय से छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बनाने और उनकी गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगा।

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