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बस्तर अंचल के कांकेर जिले में मत्स्य विभाग पर गंभीर आरोप, आदिवासी किसानों के 7 लाख रुपये की तालाब बनाने में ठगी का मामला

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Serious allegations against the Fisheries Department in Kanker district of Bastar region, case of fraud in making ponds worth Rs 7 lakh of tribal farmers

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के कांकेर जिले में नील क्रांति योजना के तहत आदिवासी किसानों को 7 लाख रुपये की ऋण राशि देने में मत्स्य विभाग की लापरवाही और ठगी का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि मत्स्य इंस्पेक्टर एस एस कंवर ने किसानों से तालाब खनन और मत्स्य पालन के लिए आवेदन तो प्राप्त किए, लेकिन उन्हें तय समय पर स्वीकृत राशि का लाभ नहीं मिला। किसानों के अनुसार, उनके द्वारा आवेदन किए गए ऋण की राशि स्वीकृत हो गई थी, लेकिन विभागीय अधिकारियों की अनदेखी और लापरवाही के कारण वह राशि उन्हें नहीं दी जा सकी।

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कांकेर जिले के विभिन्न गांवों के आदिवासी किसान, जिनमें लक्ष्मण मंडावी (ग्राम मरोड़ा), गोविंद राम (ग्राम बरका), आशीष कुमार सिन्हा (ग्राम दिल्लीडीही), प्रशांत कोल्हादार (ग्राम सुलंगी), बुधियारिन बाई (ग्राम सुलंगी), परसराम (ग्राम बरदा), सिंगल कोरेटी (ग्राम पांचंगी), जय सिंह (ग्राम कलारपारा पालवी), विश्वजीत हालदार (ग्राम चांदीपुर) और राकेश कुमार (ग्राम पंचांगी) शामिल हैं, ने यह आरोप लगाया कि उन्होंने लंबी प्रक्रिया के बाद इस ऋण के लिए आवेदन किया था और उनकी स्वीकृत राशि 7 लाख रुपये थी, लेकिन अब तक उन्हें वह राशि प्राप्त नहीं हो पाई।

किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका मामला लटका हुआ है और जब उन्होंने बार-बार विभागीय अधिकारियों से संपर्क किया तो कोई ठोस जवाब नहीं मिला। उनका आरोप है कि मत्स्य इंस्पेक्टर एस एस कंवर ने जानबूझकर उनके मामलों को अनदेखा किया और समय पर कार्रवाई नहीं की, जिससे उनकी खेती और जीवनशैली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

किसानों ने अपनी समस्याओं को लेकर गहरी नाराजगी जाहिर की और कहा कि अगर जल्द ही उनकी समस्या का समाधान नहीं किया गया तो वे उच्च अधिकारियों से संपर्क करेंगे और जरूरी कार्रवाई की मांग करेंगे। उनका कहना है कि यह राशि उनके जीवनयापन के लिए बेहद जरूरी थी और विभागीय लापरवाही की वजह से उन्हें भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है।

इस पूरे मामले ने बस्तर अंचल में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। आदिवासी किसानों का कहना है कि यदि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें समय पर और सही तरीके से नहीं मिलता तो इसका असर उनके जीवन पर पड़ता है। प्रशासन की निष्क्रियता से किसानों में निराशा और आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

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