कोयतुर या गोंड समुदाय प्रकृति पुजक होता है। हमारे पेनकड़ा पेन मंडाओं में *मुर्ति पुजा* नहीं होता बल्कि हमारे पुरखों के बानाओं की *सेवा अरजी* की जाती है । इसलिए भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि गोंड हिंदू नहीं है।नार्र गायता, पेन कड़ा,पेन मंडाओं की ब्यवस्था में प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल हनुम, पंडुम या नेंग करने की ब्यवस्था है।इन हनुम,पंडुम,नेंग से प्रकृति को कोई नुक़सान नहीं होता है। आइए हम जानते हैं कि हमारे पुरखे कौन कौन से हनुम पंडुम नेंग मनाते थे जो आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है…
*१-मरका हनुम/पंडुम* ….चैत पुन्नी से प्रारंभ होता है…आम को फलों का राजा कहा जाता है। चैत माह आते आते आम में गुठली (बीज) बन जाता है। उसके पहले उपभोग करने से भविष्य के लिए बीज की समस्या उत्पन्न हो जाती है तथा फलों में एसिड रहने से मुंह में घाव हो जाता है हमारे महान पुरखों ने शोध कर इसका पता लगाया और जन समुदाय में चैत पुन्नी तक खाने पर रोक लगा दिया।
२- *विज्जा हनुम/पंडुम… बैसाख पुन्नी* से बीज पंडुम या माटी परब शुरू हो जाता है। गायता गांव का महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है। माटी का पुजारी होता है। धरती माता का सेवा अरजी कर पहला बीज वही बिखेरता है।
*३-कुसीर हनुम/पंडुम,हरेली/अमुस… अषाढ़ अंधियारी से शुरू* …आम यदि फलों का राजा है तो जिर्रा भाजियों की रानी है, उसे पुरूड़ और पुरखों को अर्पित किए बिना कोयतुर समुदाय भक्षण नहीं करता है।
*४-रहु रवानगी नेंग* -बादव एकम से गांव गांव में रहु रवानगी नेंग या बादव जतरा शुरू किया जाता है।इस नेंग में जितने भी रोग या रहु बतास होता है उसे घर घर से इकट्ठा कर पारंपरिक सीमा या संद से बाहर रवाना कर दिया जाता है।या फिर पुर्वजों के समय से तय किया हुआ जगह में ले जा कर रवाना किया जाता है जैसे बंगाराव सुरडोंगर। गांव के पूरे रहु बतास को साफ करनें के बाद ही बाल नेंग किया जाता है।
*५-बाल नेंग.* …बादव एकम से शुरू होता है। मरहान भूमि (दिप्पा) में उगने वाले हरूना धान बादव एकम तक पकना शुरू हो चुके होते हैं। सबसे पहले पुरूड़ शक्ति, जिमीदारिन याया को समर्पित किया जाता है उसी दिन *पुनांग तिंदना पंडुम* या नयाखानी की तिथि तय किया जाता है।
*६-पुनांग पंडुम या नयाखानी परब* -बादव पुन्नी से शुरू होता है।यह कोयतुर गोंड समुदाय का सबसे बड़ा पंडुम है इसलिए कोयतुर गोंड समुदाय इसे रच्च पच्च रूप से मनाता है।इसी पंडुम में माहला किये हुए भावी बहु को भी शामिल किया जाता है ताकि वह अपने होने वाले ससुराल की रीति रिवाज से, परिवार के लोगों से परिचित हो सके।
*७-बुर्रकाल बिदा नेंग* -कुंवर एकम से शुरू होता है।बुर्रकाल मतलब शेर होता है और बिदा मतलब रवाना,दूर भगाना। बिज्जा हनुम के समय गायता वन्य प्राणियों जैसे हिरण, बारहसिंगा से फसलों की रक्षा के लिए बुर्रकाल जैसे प्राणियों को आवाहन किये रहता है,कुंवर ललेंज आते आते टिकरा मरहान भूमि का फसल कट चुका होता है ,तब बुर्रकाल जैसे प्राणियों की आवश्यकता नहीं होती है इसलिए उन्हें उनके सहयोग के बदले सेवा देकर अपने गांव की सीमा से दूर भगा दिया जाता है।
*८-सरू या चरू नेंग* -कुंवर एकम के बाद -बिज्जा हनुम के दिन से दुवार आंगन लिपना प्रतिबंधित रहता है।कुंवर ललेंज आते आते बारिश खतम हो चुका होता है, धान पक कर तैयार हो जाता है, तथा काटना भी शुरू हो चुका होता है उसे भण्डारण के लिए जमीन को साफ-सुथरा रखना आवश्यक हो जाता है,जो सरू या चरू नेंग के बाद शुरू हो जाता है।
*९-हिड़का नेंग* -यह एक *गोटुल नेंग* है कातिक एकम के बाद से यह नेंग संपन्न किया जाता है । गोटुल के लय्यह –लयोर गायता और गांव वालों की उपस्थिति में यह नेंग संपन्न होता है।इस नेंग के बाद ही हिड़का याने खीरा खाया जाता है।इस नेंग के बाद ही *दिवाड़ लय्यह* दिवाड़ नाचने जाते हैं ।
*१०-सुरोति/कुमोड़ पंडुम/दिवाड़ पंडुम* -कातिक ललेंज में अमुस में सुरोति मनाया जाता है उसके दूसरे दिन कुमोड़ पंडुम या दिवाड़ पंडुम मनाया जाता है इसी दिन से कुम्हड़ा(कुमोड़),कोचई,झुड़गा,डांगकांदा,ईमली (हित्ता) का खिचड़ी (चिकड़ी) बनाकर , खेती किसानी में सहयोग करने वाले बैलों (कोंदंग)को खिलाया जाता है, फिर सपरिवार खाया जाता है।
*११-वर्क नेंग* -पांड पुन्नी से शुरू होता है।यह भी *गोटुल* का नेंग है । गोटुल के लय्यह -लयोर, गायता और गांव वालों की उपस्थिति में *वर्क याने चिवड़ा* खानें का नेंग संपन्न किया जाता है।इस नेंग के बाद ही *गोटुल लयोर* पुस कोलंग या सेरतंग नाचने निकलते हैं।
*१२-डोकरा बिदा/कड़ा मारेंगा/मेड़ वंजिग* -यह भी कोयतुर गोंड समुदाय का बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है, इसमें धान कटाई -मिंजाई के बाद डोकरा बिदाकर कटाई -मिंजाई में सहयोग करने वाले लोगों को प्रीति भोज दिया जाता है।घर परिवार की *बहन- बेटियों (हेलड़ -मियड़)* को मान मया के लिए मेड़ वंजिग या बढ़ोनी धान दिया जाता है,कोपा (राऊत)वाले(लोहार),गांडो (गांडा)आदि को भी खेजा दिया जाता है।
*१३-नार्र पोंहचानी -* मांग एकम से नार्र पोंहचानी नेंग शुरू होता है। गांव में दरस वाली माता के शांति के लिए नार्र गायता और माता पुजारी के नेतृत्व में पोंहचानी नेंग संपन्न होता है।
*१४-माता/मावली मंडेय* -नार्र पोंहचानी नेंग के बाद गांव गांव में माता मंडेय या मावली मंडेय, गांव के प्रमुख पाटपेन के नेतृत्व में किया जाता है।
*१५-हेसा नेंग/सेसा नेंग* -मांग पुन्नी के बाद हेसा नेंग/सेसा नेंग पेन कड़ा, पेन मंडा एवं जागा बुम में संपन्न किया जाता है। इसके बाद ही नये मड़िया (गोर्रा) से पेज(जावा) बनाना शुरू किया जाता है।
*१६-साड़ नेंग* -पगुन पुन्नी से शुरू होता है।
*१७-पेन्क कर्रसना नेंग -* सेसा/हेसा नेंग के बाद,पगुन पुन्नी के बाद पेन करसड़/जतरा शुरू हो जाता है ।बीज पंडुम के दिन से पाटपेन अपने राऊड़ से बाहर नहीं निकलते हैं, हेसा/सेसा/साड़ नेंग या हनुम के बाद पाटपेन अपने राऊड़ से बाहर निकल कर मंडेय, जतरा,करसड़ में भाग लेते हैं।
उपरोक्त नेंग , हनुम, पंडुम,परब पुरखों द्वारा प्रकृति (पुरूड़ शक्ति)के संतुलन के लिए निर्धारित किए गए हैं इन हनुम,पंडुम,नेंग से प्रकृति -पर्यावरण को कोई नुक़सान नहीं होता है।ये हनुम,नेंग,पंडुम,महत्वपूर्ण मुख्यतः प्रकृति पूजन के महापर्व होते हैं। प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपहार जैसे भाजी (कुसीर पंडुम),फल -फूल (मर्रका पोलहना या आमा जोगानी),बाल नेंग, पुनांग तिंदना पंडुम, दिवाड़ पंडुम (नये अन्न) आदि। गोंड या कोयतुर समुदाय किसी भी नये फ़सल को खाने के पूर्व प्रकृति शक्ति, अपने पुरखों को अर्पित करता है फिर खुद खाता है इसलिए प्रकृति पुत्र कहलाता है।
हूर्रा महेश
सेवा मुल्ल बुमगोटुल वल्लेकनार्र



