भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति: पड़ोसियों पर करोड़ों खर्च के पीछे क्या है बड़ी कूटनीति?
नई दिल्ली: भारत हर साल अपने पड़ोसी देशों पर करोड़ों और अरबों रुपये खर्च करता है, जो सिर्फ सद्भावना का प्रतीक नहीं बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। नई दिल्ली का यह निवेश केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा, चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने और भारत के रणनीतिक हितों को साधने जैसी कई गहरी वजहें हैं।
पड़ोसी पहले की नीति: संबंधों की बुनियाद
भारत की विदेश नीति का एक अहम स्तंभ ‘पड़ोसी पहले’ की नीति (Neighbourhood First Policy) है। इस नीति का उद्देश्य अपने तत्काल पड़ोसियों के साथ मजबूत और सहयोगपूर्ण संबंध स्थापित करना है। भारत मानता है कि एक स्थिर और समृद्ध पड़ोस ही उसकी अपनी सुरक्षा और विकास के लिए आवश्यक है। इसी कारण वह सड़क, रेल, ऊर्जा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में विभिन्न परियोजनाओं के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करता है।
चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला
हाल के वर्षों में, चीन ने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से भारत के पड़ोस में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पैठ बढ़ाई है। कई देशों को दिए गए भारी कर्ज और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के कारण ‘कर्ज जाल कूटनीति’ की चिंताएं भी बढ़ी हैं। भारत अपने पड़ोसियों को चीन का एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान करने की कोशिश करता है, ताकि वे किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भर न हों। भारतीय सहायता परियोजनाओं को अक्सर अधिक पारदर्शी और पारस्परिक रूप से लाभप्रद माना जाता है।
क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा
पड़ोसी देशों में अस्थिरता, आर्थिक संकट या आतंकवाद का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। भारत की सहायता इन देशों में स्थिरता लाने, चरमपंथ का मुकाबला करने और शांति को बढ़ावा देने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, नेपाल और भूटान में जलविद्युत परियोजनाओं में निवेश न केवल उन देशों को बिजली देता है, बल्कि भारत को भी स्वच्छ ऊर्जा और बाढ़ नियंत्रण में मदद करता है। बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों के साथ सीमा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
आर्थिक एकीकरण और कनेक्टिविटी
भारत अपने पड़ोसियों के साथ बेहतर कनेक्टिविटी और आर्थिक एकीकरण पर जोर देता है। बंदरगाहों (जैसे ईरान में चाबहार), सड़कों (जैसे BBIN – बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल – मोटर वाहन समझौता) और रेलवे लाइनों में निवेश से व्यापार, पर्यटन और लोगों की आवाजाही को बढ़ावा मिलता है। यह न केवल क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ाता है, बल्कि भारत को पड़ोसी बाजारों तक पहुंच भी प्रदान करता है और उप-क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करता है।
सॉफ्ट पावर और कूटनीतिक लाभ
वित्तीय सहायता और विकास परियोजनाओं के माध्यम से भारत अपने पड़ोसियों के बीच सद्भावना और सॉफ्ट पावर का निर्माण करता है। मानवीय सहायता, आपदा राहत, क्षमता निर्माण कार्यक्रम (जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य में), और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भारत को एक विश्वसनीय और जिम्मेदार भागीदार के रूप में स्थापित करते हैं। यह उसकी कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके हितों को आगे बढ़ाने में मदद करता है।
ऊर्जा और संसाधन सुरक्षा
नेपाल और भूटान जैसे देशों में जलविद्युत परियोजनाओं में भारत का निवेश उसकी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का भी हिस्सा है। इन परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली भारत को मिलती है, जिससे उसकी बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलती है।
संक्षेप में, भारत द्वारा पड़ोसी देशों में किया गया अरबों का निवेश केवल दान नहीं है। यह एक दूरदर्शी कूटनीति है, जिसका लक्ष्य साझा समृद्धि, क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत के अपने रणनीतिक हितों को बढ़ावा देना है।



