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जिला स्तरीय वैद्य सम्मेलन पारंपरिक औषधीय ज्ञान के संरक्षण एवं संवर्धन पर दिया गया जोर

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उत्तर बस्तर कांकेर, छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम के मुख्य आतिथ्य में आज सिंगारभाट स्थित नीलम कक्ष, काष्ठागार डिपो में जिला स्तरीय वैद्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में जिले के तीनों वनमंडलों के अंतर्गत आने वाले सभी सात विकासखंडों से बड़ी संख्या में पारंपरिक वैद्यों ने भाग लिया। सम्मेलन में वैद्यों ने अपने पारंपरिक औषधीय ज्ञान, जड़ी-बूटियों के उपयोग तथा उपचार पद्धतियों का आदान-प्रदान किया।

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मुख्य अतिथि श्री विकास मरकाम ने वैद्य सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि कांकेर जिले के पारंपरिक वैद्य समाज सेवा का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सम्मानजनक कार्य कर रहे हैं। वैद्य न केवल जड़ी-बूटियों के माध्यम से लोगों का उपचार करते हैं, बल्कि औषधीय पौधों के संरक्षण एवं संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। छत्तीसगढ़ को “हर्बल स्टेट” के रूप में स्थापित करने में पारंपरिक वैद्यों की अहम भूमिका है। उन्होंने अधिक से अधिक वैद्यों से अपना पंजीयन कराने, औषधीय पौधों के माध्यम से आय बढ़ाने तथा शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाने का आग्रह किया। साथ ही स्कूलों में हर्बल गार्डन, औषधीय उद्यान तथा दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षण एवं संवर्धन पर भी विशेष बल दिया। श्री मरकाम ने बताया कि प्रदेश में अब तक लगभग 1,300 पारंपरिक वैद्यों का पंजीयन किया जा चुका है। नारायणपुर के पद्मश्री सम्मानित पारंपरिक वैद्य श्री हेमचंद मांझी का उल्लेख करते हुए उन्होंने सभी वैद्यों को अपने पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण करने तथा समाजहित में निस्वार्थ भाव से सेवा करते रहने के लिए भी प्रेरित किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए औषधि पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री अंजय शुक्ला ने कहा कि उपचार में उपयोग होने वाली जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण एवं सुरक्षित भंडारण अत्यंत आवश्यक है। विशेषकर वर्षा ऋतु में औषधीय सामग्री के खराब होने की संभावना अधिक रहती है, इसलिए उनके उचित संरक्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षण एवं उनके संवर्धन की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

औषधि पादप बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री जे.ए.सी.एस. राव ने कहा कि पारंपरिक वैद्य निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने सभी वैद्यों से पंजीयन कराने का आग्रह करते हुए बताया कि जड़ी-बूटियों को पीसने, चूर्ण एवं तरल औषधि तैयार करने के लिए मशीनों की व्यवस्था की जाएगी। इच्छुक वैद्य अपने क्षेत्र के उपयुक्त गांवों में इन मशीनों की स्थापना कर सकेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि स्कूल हर्बल गार्डन एवं दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए शासन द्वारा प्रोत्साहन एवं आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। सम्मेलन के दौरान विभिन्न ग्रामों से आए वैद्यों ने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों, जड़ी-बूटियों की पहचान, संग्रहण, संरक्षण एवं उपचार संबंधी अपने अनुभव साझा किए। इस ज्ञान-विनिमय से पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई। कार्यक्रम में वनमंडलाधिकारी श्री रौनक गोयल, वैद्य संघ के अध्यक्ष श्री वीर सिंह पद्दा, वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी तथा जिले के बड़ी संख्या में पारंपरिक वैद्य उपस्थित रहे।

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