*ब्रह्माकुमारीज प्रभु अनुराग भवन में सुखद जीवन का आधार गीता सार का दूसरा दिन l*
मस्तूरी। कोटमी सोनार में श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान श्रृंखला के द्वितीय दिवस पर बी.के. शशीप्रभा दीदी, राजयोग शिक्षिका एवं गीता सार प्रवक्ता ने महाभारत के पांडवों और कौरवों के आध्यात्मिक रहस्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे सद्बुद्धि और विपरीत बुद्धि के संघर्ष का प्रतीक है।
उन्होंने बताया कि मुनिवर वेदव्यास जी ने पांडवों और कौरवों के माध्यम से मानव जीवन को गहरी सीख दी। युधिष्ठिर स्थिर बुद्धि, अर्जुन ज्ञान-अर्जन एवं ईश्वर की शरणागति, भीम दृढ़ इच्छाशक्ति, नकुल नियम-सिद्धांत और सहदेव श्रेष्ठ कार्यों में सहयोग के प्रतीक हैं। कम संख्या में होते हुए भी पांडवों की प्रीतबुद्धि उन्हें विजय की ओर ले जाती है।
वहीं दुर्योधन अहंकार, अनुशासनहीनता और शक्ति के दुरुपयोग की प्रवृत्ति का प्रतीक है। दुःशासन संयम एवं अनुशासन के अभाव तथा दुःशला चरित्र-पतन की चेतावनी देती है। धृतराष्ट्र मोह के कारण सत्य को न देख पाने वाली अंधी बुद्धि तथा गांधारी सत्य को पहचानने के बावजूद स्वयं को उससे दूर कर लेने की मानसिकता का प्रतीक मानी जा सकती हैं।
*बी.के. शशीप्रभा दीदी ने कहा कि* आज का कुरुक्षेत्र हमारे बाहर नहीं, हमारे मन के अंदर है। राजयोग और ईश्वरीय ज्ञान के द्वारा मनुष्य अपनी विपरीत बुद्धि को प्रीतबुद्धि में बदलकर अपने अंदर के विकारों पर विजय प्राप्त कर सकता है। स्वयं का परिवर्तन ही विश्व परिवर्तन का आधार है। आज की कथा पर भारी संख्या में श्रद्धालुओं द्वारा कथा रूपी अमृत पान किया।



