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नील-हरित शैवाल के संबंध में तकनीकी सलाह जारी

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उत्तर बस्तर कांकेर 22 अप्रैल 2026/ उप संचालक कृषि ने नील-हरित शैलान के संबंध में जिले के किसानों को तकनीकी सलाह जारी की है। उन्होंने बताया कि वास्तव में यह शैवाल नहीं बल्कि सायनोबैक्टीरिया नामक सूक्ष्म, प्रकाश संश्लेषक जीवाणुओं का एक समूह है, जो ताजे पानी और नम मिट्टी में पाए जाते हैं। ये वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और धान की फसल के लिए एक बेहतरीन, सस्ती जैविक खाद के रूप में कार्य करते हैं। नील-हरित काई सामान्य रूप से धान के फसल को करीब 25-30 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर नाईट्रोजन की पूर्ति करता है। धान के खड़ी फसल में नील हरित काई की 10 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है।
नील-हरित शैवाल जैव-उर्वरक के लाभः-
यह धान के खेतों में मुक्त जीवी के रूप में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है, जिससे 55-65 कि.ग्रा. तक यूरिया का बचत किया जा सकता है। यह रासायनिक उर्वरकों जैसे- यूरिया का पूरक है, जो कि मिट्टी की उर्वरता और कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाता है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक है और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है। यह मिट्टी की क्षारीय स्थिति में सुधार लाकर बीजों के जल्दी अंकुरण में मदद करता है।
नील-हरित शैवाल की प्रयोग विधिः- धान की रोपाई के 7-10 दिन बाद, 10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में सामान रूप से बिखेरें। प्रयोग करते समय खेत में 5-10 से.मी. पानी भरा होना चाहिए। किसानों को बताया गया कि इसका उपयोग केवल धान के लिए किया जाए, किसी अन्य फसलों के लिए नहीं। यह जैव उर्वरक टिकाऊ खेती के लिए एक सस्ता और प्रभावी विकल्प है।

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