मुंगेली जिला से हरजीत भास्कर की रिपोर्ट
मुंगेली/लोरमी। – छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के लोरमी ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत सरईपतेरा इन दिनों कथित अवैध उत्खनन के मामले को लेकर सुर्खियों में है। गांव के तालाब को गहरा करने और विकास कार्य के नाम पर जिस तरह बड़े पैमाने पर मिट्टी की खुदाई की जा रही है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यह कार्य नियमों के विरुद्ध किया जा रहा है और इसके पीछे निजी लाभ कमाने की मंशा छिपी हुई है।
गांव के लोगों का कहना है कि सरपंच नारायण प्रसाद साहू के द्वारा तालाब की खुदाई के नाम पर 10 फीट से अधिक गहराई तक खनन कराया जा रहा है। सामान्यतः तालाब गहरीकरण या जल संरक्षण कार्यों में सीमित और तकनीकी मानकों के अनुरूप खुदाई की जाती है, लेकिन यहां बिना किसी मानक का पालन किए अंधाधुंध उत्खनन हो रहा है। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने का खतरा है, बल्कि गांव में किसी भी समय बड़ी दुर्घटना की आशंका भी बनी हुई है।
ग्रामीणों ने बताया कि खुदाई स्थल पर सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं। खुले गड्ढे, बिना बैरिकेडिंग के खतरनाक स्थिति पैदा कर रहे हैं। बच्चों और मवेशियों के गिरने की आशंका लगातार बनी हुई है। कई ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि तालाब की मिट्टी को ट्रैक्टरों के माध्यम से बाहर भेजा जा रहा है और इसे बेचा जा रहा है।
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि ग्राम पंचायत के सचिव सागर जायसवाल ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पंचायत की ओर से खनन के लिए न तो कोई प्रस्ताव पारित किया गया है और न ही किसी प्रकार की अनुमति दी गई है। इसका सीधा मतलब है कि यह पूरा कार्य बिना वैधानिक प्रक्रिया के किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यदि यह कार्य वास्तव में तालाब गहरीकरण के तहत किया जा रहा होता, तो इसके लिए तकनीकी स्वीकृति, बजट और कार्ययोजना होती, साथ ही निकाली गई मिट्टी का उपयोग पंचायत क्षेत्र में ही सार्वजनिक कार्यों में किया जाता। लेकिन यहां जो स्थिति सामने आ रही है, वह पूरी तरह संदिग्ध है।
मामले ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विपक्षी दलों ने इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ शासन के उपमुख्यमंत्री एवं लोरमी विधायक अरुण साव के क्षेत्र में इस तरह खुलेआम अवैध उत्खनन होना प्रशासन की नाकामी को दर्शाता है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि बिना राजनीतिक संरक्षण के इस तरह का कार्य संभव नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, इस मामले में कुछ स्थानीय नेताओं के नाम भी सामने आ रहे हैं, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है। फिर भी यह चर्चा पूरे क्षेत्र में जोर पकड़ रही है, जिससे सियासी माहौल गर्म हो गया है।
प्रशासनिक स्तर पर स्थिति और भी उलझी हुई नजर आ रही है। जब लोरमी एसडीएम अजीत पुजारी से इस विषय में जानकारी ली गई, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि अवैध खनन पर कार्रवाई का अधिकार खनन विभाग के पास है। उनका कहना है कि खनन विभाग ही इस पर जांच कर उचित कार्रवाई करेगा। मेरे पास किसी प्रकार की कोई अधिकार नहीं है,लेकिन जब मुंगेली जिला खनिज विभाग के अधिकारी डी. साहू से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उनका मोबाइल बंद मिला। इससे यह सवाल और गहरा गया है कि आखिर जिम्मेदार विभाग इस गंभीर मामले में चुप क्यों है? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर किसी प्रकार का दबाव?
👉कानून क्या कहता है?
यदि यह साबित होता है कि तालाब की खुदाई के नाम पर अवैध उत्खनन किया गया है और मिट्टी का व्यावसायिक उपयोग किया गया है, तो संबंधित व्यक्तियों पर कई कड़े कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं—
खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) के तहत बिना अनुमति खनन करना दंडनीय अपराध है।
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 379 (चोरी), 420 (धोखाधड़ी) और 188 (सरकारी आदेश की अवहेलना) लागू हो सकती है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत भी कार्रवाई का प्रावधान है।
इन कानूनों के तहत दोषियों पर भारी जुर्माना, नुकसान की भरपाई और जेल तक की सजा हो सकती है।
👉जवाबदेही का संकट
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पंचायत ने अनुमति नहीं दी, ग्रामीणों ने शिकायत की, और प्रशासन को जानकारी भी है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या विभागीय समन्वय की कमी है या फिर जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर चुप्पी साधे हुए हैं?
सरईपतेरा का यह मामला अब एक गांव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बनेगा, बल्कि पर्यावरण और जन सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा साबित हो सकता है।
👉आगे क्या?
अब निगाहें जिला प्रशासन और खनन विभाग पर टिकी हैं। क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी? क्या दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
सरईपतेरा की यह कहानी केवल अवैध उत्खनन की नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही, पारदर्शिता और शासन की गंभीरता की परीक्षा बन चुकी है।



