धान की फसल घर आने की खुशी में बच्चों और महिलाओं ने टोली बनाकर मांगा छेरछेरा
दशपुर । ग्राम दशपुर बेवरती सरंगपाल में छत्तीसगढ़ का पारंपरिक एवं सांस्कृतिक महापर्व छेरछेरा बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया। इस अवसर पर गांव में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी इस लोकपर्व में बढ़-चढ़कर शामिल हुए।
छेरछेरा पर्व की शुरुआत 2 जनवरी की शाम से ही हो गई थी, जब गांव की महिलाएं और बच्चे छोटे-छोटे समूह बनाकर घर-घर दस्तक देने लगे। वहीं 3 जनवरी को यह उत्सव पूरे जोश के साथ मनाया गया। ग्रामीण अंचल के साथ-साथ कांकेर शहर से भी महिलाएं एवं बच्चे टोली बनाकर गांव पहुंचे और घरों के साथ दुकानों में जाकर छेरछेरा की परंपरा निभाई।
इस दौरान कांकेर शहर के जवाहर वार्ड की पार्षद चित्ररेखा जैन भी मोहल्ले की महिलाओं की टीम के साथ नियमित रूप से छेरछेरा मांगते हुए नजर आईं। उन्होंने इस पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। इसी समय किसानों की धान की फसल खेत और खलिहानों से घर आ जाती है। फसल की अच्छी पैदावार और समृद्धि की खुशी में किसान छेरछेरा पर्व पर दान-पुण्य करते हैं, जिसे सामाजिक एकता और आपसी सहयोग का प्रतीक माना जाता है।
छेरछेरा टीम में शामिल श्यामली यादव, पूर्णिमा यादव, कचरा यादव, धनी कथोरिया एवं प्रज्ञा मेश्राम ने भी इस पर्व के धार्मिक और सामाजिक महत्व को साझा किया। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में छेरछेरा एक महत्वपूर्ण त्योहार है। इस दिन लोग प्रातःकाल उठकर पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और फिर अपने घरों में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
छेरछेरा के दौरान लोग पारंपरिक गीत गाते हुए घर-घर जाते हैं और अन्न, चावल, दाल, पैसे आदि का दान प्राप्त करते हैं। यह पर्व न केवल दान और परोपकार की भावना को बढ़ावा देता है, बल्कि समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत करता है।
ग्राम दशपुर बेवरती में छेरछेरा पर्व के आयोजन से यह स्पष्ट दिखाई दिया कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत जीवंत रूप में सुरक्षित हैं। बच्चों और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने इस पर्व को और भी खास बना दिया। गांव के लोगों ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ महापर्व छेरछेरा को सफलतापूर्वक मनाया।



