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पानी की चोरी और बर्बादी… प्लास्टिक पॉल्यूशन,बच्चों से गुलामी, नेस्ले से जुड़े विवाद:कंपनी पर लग चुके हैं ऐसे आरोप

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Theft and wastage of water… Plastic pollution, child slavery, controversies related to Nestle: such allegations have been made against the company.

स्विट्जरलैंड की कंज्यूमर गुड्स कंपनी नेस्ले एक बार फिर से विवादों में है. जांच में पाया गया है कि नेस्ले भारत में बिकने वाले अपने बेबी प्रोडक्ट्स में जरुरत से ज्यादा चीनी का इस्तेमाल करती है. जबकि कंपनी अपने इन्हीं प्रोडक्ट्स को यूरोप, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देशों में बिना चीनी के बेचती है.
नेस्ले मैगी नूडल्स का विवाद याद है आपको?नेस्ले का भारत में सबसे बड़ा ब्रांड था मैगी नूडल्स. मगर साल 2015 में भारत में मैगी नूडल्स बेचना बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा था. देश की सभी दुकानों पर करीब 38,000 टन मैगी नूडल्स कंपनी ने वापस ले लिया था और बाद में नष्ट कर दिया था. इस वापसी का नेस्ले इंडिया पर बहुत बड़ा नुकसान हुआ था. मैगी का मार्केट शेयर 80% से गिरकर सीधे 0% पर आ गया था.

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ये बात है साल 1977 की. लोगों को कंपनी की ये बात बहुत बुरी लगी और अमेरिका में नेस्ले के सामान का बहिष्कार शुरू हो गया. बाद में, ये बहिष्कार यूरोप के देशों तक भी फैल गया था. ये बहिष्कार 1984 तक चलता रहा. आखिरकार नेस्ले कंपनी को विश्व स्वास्थ्य संगठन के कुछ नियम मानने पड़े और उसके बाद ही अमेरिका में ये बहिष्कार रुका. मतलब यह है कि नेस्ले ने कुछ गलत तरीके अपनाकर अपना सामान बेचने की कोशिश की जिसकी वजह से उसका बहुत विरोध हुआ.

पहले जानिए क्या है नेस्ले के बेबी प्रोडक्ट के साथ विवाद

एक रिपोर्ट के अनुसार, नेस्ले गरीब देशों जैसे भारत में बेचे जाने वाले बच्चों के दूध में चीनी मिलाता है, जबकि यूरोप या ब्रिटेन जैसे अमीर देशों में नहीं मिलाता. ये खुलासा तब हुआ जब स्विट्जरलैंड के एक खोजी संगठन ‘पब्लिक आई’ और शिशु आहार पर नजर रखने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन आईबीएफएएन ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बिकने वाले नेस्ले के बच्चों के खाने के सैंपल इकट्ठा कर बेल्जियम की एक लैब में जांच के लिए भेजे.

भारत में 2022 में नेस्ले की बिक्री 25 करोड़ डॉलर से भी ज्यादा रही. दावा किया जा रहा है कि नेस्ले के सेरेलैक (Cerelac) और निडो बेबी प्रोडक्ट (Nido Baby Product) में प्रति सर्विंग लगभग 3 ग्राम चीनी है. ‘पब्लिक आई’ की जांच में ये पाया गया कि जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन में 6 महीने के बच्चों के लिए बेचे जाने वाले गेहूं से बने नेस्ले के सेरेलैक में कोई अतिरिक्त चीनी नहीं होती. वहीं इथियोपिया में इसी प्रोडक्ट के एक डिब्बे में 5 ग्राम और थाईलैंड में 6 ग्राम से ज्यादा चीनी होती है.

नेस्ले ने विवाद पर क्या कहा

हालांकि नेस्ले कंपनी ने इस पूरे विवाद पर अपनी सफाई दी है. कंपनी ने कहा, “हम बच्चों के खाने में सही मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, मिनरल्स और आयरन जैसी जरूरी चीजें डालते हैं. हम अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी के साथ कोई समझौता नहीं करते. हम अपने ग्राहकों को सबसे अच्छा और पौष्टिक प्रोडक्ट देने के लिए लगातार काम करते हैं.”

नेस्ले इंडिया के प्रवक्ता ने कहा, “नियमों का पालन करना हमारे लिए अहम है. हम इस पर कभी समझौता नहीं करेंगे. नेस्ले इंडिया के लिए अतिरिक्त चीनी कम करना प्राथमिकता है. पिछले 5 सालों में हमने अलग-अलग प्रोडक्ट पर पहले ही 30% तक अतिरिक्त चीनी कम कर दी है. हम नियमित रूप से अपने उत्पादों की समीक्षा करते हैं. हम 100 से ज्यादा सालों से काम रहे हैं और हम हमेशा अपने उत्पादों में पोषण, गुणवत्ता, सुरक्षा के उच्चतम मानकों को बनाए रखेंगे.” नेस्ले मैगी नूडल्स का विवाद याद है आपको?

नेस्ले का भारत में सबसे बड़ा ब्रांड था मैगी नूडल्स. मगर साल 2015 में भारत में मैगी नूडल्स बेचना बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा था. देश की सभी दुकानों पर करीब 38,000 टन मैगी नूडल्स कंपनी ने वापस ले लिया था और बाद में नष्ट कर दिया था. इस वापसी का नेस्ले इंडिया पर बहुत बड़ा नुकसान हुआ था. मैगी का मार्केट शेयर 80% से गिरकर सीधे 0% पर आ गया था. मैगी की बिक्री से उस वक्त नेस्ले इंडिया की कमाई का 25% से ज्यादा हिस्सा आता था, इसलिए ये पाबंदी कंपनी के लिए भारत में उसके पूरे कारोबार के लिए खतरा बन गई थी.

अमेरिका में माओं को स्तनपान से रोकने का आरोप

अमेरिका में नेस्ले पर आरोप लगा कि कंपनी माओं को बच्चों के लिए अपना दूध पिलाने से रोकती है ताकि उनका बेबी फॉर्मूला (दूध पाउडर) ज्यादा बिके. कंपनी ये दावा करती थी कि उसका बेबी फार्मूला प्रोडक्ट ज्यादा सेहतमंद है, जबकि इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं थे.

ये बात है साल 1977 की. लोगों को कंपनी की ये बात बहुत बुरी लगी और अमेरिका में नेस्ले के सामान का बहिष्कार (बॉयकॉट) शुरू हो गया. बाद में, ये बहिष्कार यूरोप के देशों तक भी फैल गया था. ये बहिष्कार 1984 तक चलता रहा. आखिरकार नेस्ले कंपनी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के कुछ नियम मानने पड़े और उसके बाद ही अमेरिका में ये बहिष्कार रुका. मतलब यह है कि नेस्ले ने कुछ गलत तरीके अपनाकर अपना सामान बेचने की कोशिश की जिसकी वजह से उसका बहुत विरोध हुआ.

बच्चों से गुलामी कराने का आरोप

नेस्ले को बच्चों से खेतों में जबरदस्ती मजदूरी कराने के आरोपों को लेकर भी कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ा है. यूटोपिया डॉट ओआरजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 में नेस्ले पर आरोप लगा कि वो आइवरी कोस्ट के कोकोआ फार्मों में बच्चों से जबरदस्ती मजदूरी करवाती है. कुछ पूर्व बाल मजदूरों ने नेस्ले पर मुकदमा भी दायर किया था. उन्होंने कहा कि कंपनियों को मालूम था कि अवैध रूप से बच्चों को गुलाम बनाकर काम करवाया जा रहा है, मगर फिर भी उन्होंने कुछ नहीं किया.
हालांकि 2022 में एक अमेरिकी अदालत ने इस मामले को खारिज कर दिया क्योंकि ये साबित नहीं हो पाया कि नेस्ले का सीधा संबंध किन खास खेतों से था जहां ये बच्चे काम करते थे.

नेस्ले पर पानी चुराने का आरोप

साल 1988 में नेस्ले पर पानी चुराने का आरोप भी लग चुका है. अमेरिका के कैलिफोर्निया में अक्सर सूखा पड़ता है वहां पानी की बहुत कमी हो जाती है. इसके बावजूद 1988 से नेस्ले वहां एक जंगल से पानी निकाल रहा थी और उसके लिए बहुत ही कम पैसा देता था. उसका पानी निकालने का परमिट भी खत्म हो गया था. लोगों का कहना था कि जब राज्य को पानी की इतनी जरूरत है तो नेस्ले को इतने सस्ते में पानी निकालने की इजाजत नहीं देनी चाहिए. इस मामले में अमेरिका की अदालतों में कई याचिकाएं डाली गई.

प्लास्टिक प्रदूषण में सबसे आगे!
नेस्ले पर एक आरोप ये भी है कि उसके सामान की पैकिंग के लिए बहुत सारा प्लास्टिक इस्तेमाल होता है. पर्यावरण की चिंता करने वाले लोग कहते हैं कि नेस्ले प्लास्टिक के कचरे को सही से नहीं हटाती, जिससे प्रदूषण फैसता है.

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