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बिलासपुर हाईकोर्ट का अहम फैसला: सिर्फ रिश्वत की बरामदगी से दोष सिद्ध नहीं, शिक्षा विभाग के मंडल संयोजक बरी

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बिलासपुर, छत्तीसगढ़: भ्रष्टाचार के एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बड़ा और राहत भरा फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने एक अहम सिद्धांत स्थापित करते हुए शिक्षा विभाग के आरोपी मंडल संयोजक को बरी कर दिया है। इस फैसले से शिकायतकर्ता को 12 साल बाद न्याय मिलने का दावा किया जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल रिश्वत की राशि की बरामदगी दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक यह साबित न हो जाए कि आरोपी ने स्वेच्छा से पैसे को रिश्वत के तौर पर स्वीकार किया था।


 

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क्या था पूरा मामला?

यह मामला जनवरी 2013 का है। शासकीय प्राथमिक विद्यालय में शिक्षाकर्मी और आदिवासी हॉस्टल के तत्कालीन अधीक्षक बैजनाथ नेताम ने आरोप लगाया था कि मंडल संयोजक लवन सिंह चुरेन्द्र ने उनसे छात्रवृत्ति की स्वीकृति के लिए 10,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। नेताम ने 2,000 रुपये अग्रिम दिए और शेष 8,000 रुपये देने का वादा किया था। बाद में शिकायतकर्ता ने एसीबी (एंटी-करप्शन ब्यूरो) में शिकायत दर्ज कराई और आरोपी को ट्रैप कर गिरफ्तार करवाया गया।

यह बात भी सामने आई कि शिकायतकर्ता बैजनाथ नेताम के खिलाफ खुद छात्रवृत्ति राशि में गड़बड़ी करने की शिकायत हुई थी। इस मामले की जांच के लिए लवन सिंह चुरेन्द्र को ही जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था। जांच में शिकायत सही पाए जाने पर चुरेन्द्र ने नेताम के खिलाफ रिकवरी आदेश जारी किया था। विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) रायपुर ने 2017 में आरोपी लवन सिंह चुरेन्द्र को इस मामले में दो साल की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की थी।


 

हाईकोर्ट ने क्यों किया बरी?

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर गौर किया, जिसके आधार पर आरोपी को बरी करने का फैसला लिया गया:

शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता संदिग्ध: कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता संदिग्ध थी क्योंकि वह पहले ही सेवा से बर्खास्त किया जा चुका था।

पहले ही मंजूर हो चुकी थी छात्रवृत्ति: जिस छात्रवृत्ति की मंजूरी के लिए रिश्वत मांगे जाने का आरोप था, वह वास्तव में पहले ही मंजूर हो चुकी थी और राशि भी शिकायतकर्ता द्वारा निकाली जा चुकी थी।

बदले की भावना का संदेह: आरोपी लवन सिंह चुरेन्द्र स्वयं शिकायतकर्ता के खिलाफ 50,700 रुपये की छात्रवृत्ति गबन की जांच कर रहे थे और वसूली के निर्देश भी दिए थे। इस कारण शिकायतकर्ता की शिकायत को बदले की भावना से प्रेरित माना गया।

ऑडियो रिकॉर्डिंग पर सवाल: शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज की गई ऑडियो रिकॉर्डिंग की सत्यता पर भी सवाल उठे। कोर्ट ने पाया कि न तो आवाज की पुष्टि कराई गई थी और न ही कोई फोरेंसिक जांच कराई गई थी।

गवाहों की गवाही में विरोधाभास: ट्रैप पार्टी में मौजूद मुख्य गवाहों की गवाही भी विरोधाभासी पाई गई, जिससे अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ गया।


 

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला

 

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी भी दोषसिद्धि के लिए यह अनिवार्य है कि रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकारोक्ति स्पष्ट रूप से सिद्ध हो। केवल पैसे की बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं होता। कोर्ट ने अपने फैसले में बी. जयाराज बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और नीरज दत्ता बनाम दिल्ली सरकार सहित सुप्रीम कोर्ट के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया। इन निर्णयों में भी यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल पैसों की बरामदगी से ही दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता, बल्कि आरोपी की मंशा और स्वेच्छा से रिश्वत स्वीकार करने का प्रमाण भी अनिवार्य है।

कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए बरी कर दिया। चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर था, कोर्ट ने उनके जमानत बंधपत्र को अगले छह महीने तक प्रभावी रखने का निर्देश दिया है, ताकि यदि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील करना चाहे तो उचित कानूनी कदम उठा सके। यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन पक्ष के लिए मजबूत सबूतों की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।

 

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