नई दिल्ली: अब पति-पत्नी के बीच की निजी बातचीत, चाहे वह गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई हो या व्हाट्सएप चैट हो, तलाक और अन्य वैवाहिक मामलों में अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि ऐसे मामले में निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा और इन रिकॉर्डिंग को सबूत मानने के लिए सहमति जरूरी नहीं है। यह फैसला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश को पलटते हुए आया है, जिसने ऐसे सबूतों की स्वीकार्यता को सीमित कर दिया था।
क्यों बदला फैसला?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के 2021 के एक आदेश को रद्द करते हुए यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। सुप्रीम कोर्ट ने तर्क दिया कि अगर किसी शादी में इतनी कड़वाहट आ गई है कि पति-पत्नी छुप-छुप कर एक-दूसरे की रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, तो ये रिकॉर्डिंग रिश्ते टूटने का कारण नहीं, बल्कि उसका नतीजा हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे सबूतों को स्वीकार करना घरेलू निगरानी को बढ़ावा नहीं देगा और न ही वैवाहिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि यह न्याय सुनिश्चित करने में मदद करेगा।
निजता का उल्लंघन नहीं माना जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच की बातचीत को गुप्त रूप से रिकॉर्ड करना निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 का हवाला दिया। यह धारा सामान्यतः पति या पत्नी को दूसरे की सहमति के बिना शादी के दौरान हुई बातचीत को सार्वजनिक करने से रोकती है। हालाँकि, कोर्ट ने जोर दिया कि अगर मामला अदालत में चल रहा है या एक पति या पत्नी पर दूसरे के खिलाफ अपराध करने का आरोप है, तो यह नियम लागू नहीं होता है। इस छूट को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के आलोक में समझा जाना चाहिए।
इससे पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी इसी तरह का रुख अपनाते हुए व्हाट्सएप चैट को सबूत मानने की बात कही थी, भले ही वे बिना इजाजत के हासिल की गई हों।
सबूतों की स्वीकार्यता के लिए शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस तरह के गुप्त रूप से रिकॉर्ड किए गए सबूतों को सही साबित करने के लिए कुछ शर्तों को पूरा करना होगा। ये शर्तें हैं:
- प्रासंगिकता: सबूत मामले से सीधे तौर पर संबंधित होना चाहिए।
- पहचान: सबूत की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए कि वह किससे संबंधित है।
- सटीकता: सबूत सटीक और छेड़छाड़ रहित होना चाहिए।
हालांकि, इन सबूतों को स्वीकार करने के लिए सहमति कानून के तहत जरूरी नहीं है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 2009 में हुई एक शादी से जुड़ा है। इस दंपति की एक बेटी है, जिसका जन्म 2011 में हुआ था। पति ने 2017 में पत्नी पर क्रूरता (cruelty) के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी। इस दौरान, उसने 2010 और 2016 में गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई बातचीत की मेमोरी कार्ड, सीडी और ट्रांसक्रिप्ट के साथ एक पूरक हलफनामा पेश करने की मांग की।
बठिंडा फैमिली कोर्ट ने फैमिली कोर्ट एक्ट का हवाला देते हुए इस सबूत को स्वीकार कर लिया था। लेकिन, पत्नी ने इस फैसले को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और गुप्त रिकॉर्डिंग को स्वीकार्य नहीं माना। इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने अंततः हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से तलाक और अन्य पारिवारिक विवादों में सबूत पेश करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव आने की उम्मीद है।



