Open violation of order: On teacher attachment in Gharghoda, schools locked and silent
अटैचमेंट समाप्त करने का कैबिनेट से हुआ था आदेश
शासन आदेश की धज्जियां उड़ाते कार्यालय, केंद्रों में अटैच कर्मी
छत्तीसगढ़ शासन ने ट्रांसफर नीति 2025 की कंडिका 3.17 के तहत सभी अटैचमेंट 5 जून 2025 से स्वतः समाप्त घोषित कर दिए थे। बावजूद इसके घरघोड़ा विकासखंड में कई शिक्षक आज भी अपने मूल विद्यालयों की बजाय शिक्षा विभाग के दफ्तरों या अन्य सुविधाजनक स्थानों पर अटैचमेंट में काम कर रहे हैं। आदेश की खुलेआम अवहेलना से यह साफ जाहिर होता है कि ज़मीनी स्तर पर कोई निगरानी या कार्रवाई नहीं हो रही है। स्थानीय स्तर पर अधिकारी भी चुप्पी साधे हुए हैं, जिससे शासन के आदेशों की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। इतना ही नहीं, अन्य विभागों—के कई कर्मचारी भी वर्षों से अटैचमेंट पर जमे हुए हैं, जिनकी मूल पदस्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में है।
बच्चों की पढ़ाई ठप, गांवों में स्कूल भवन लेकिन नहीं हैं शिक्षक
घरघोड़ा क्षेत्र के ग्रामीण स्कूलों की हालत बेहद चिंताजनक है। स्कूल भवन तो हैं, लेकिन उनमें पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं हैं। कहीं प्रधानपाठक अकेले पूरे विद्यालय को संभालने की कोशिश कर रहा है, तो कहीं बच्चों को केवल मध्यान्ह भोजन मिल रहा है लेकिन पढ़ाई नहीं हो रही। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षक तो कस्बे में बैठकर कार्यालयों में काम कर रहे हैं, लेकिन स्कूल में उनका चेहरा महीनों से नहीं देखा गया। कई गाँवों में स्कूलों पर ताले लटकते पाए गए, और बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई है। कुछ स्थानों पर ग्रामीणों ने सामूहिक आवेदन देकर स्थिति की शिकायत भी की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
सरकारी आदेशों की अवहेलना पर जिम्मेदार कौन?
शासन द्वारा अटैचमेंट समाप्त करने का आदेश पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया था, लेकिन यदि इसका पालन ही न हो तो यह आदेश कागज़ी बनकर रह जाता है। घरघोड़ा जैसे अनेकों क्षेत्रों में अधिकारी और कर्मचारी अपने प्रभाव का उपयोग कर अटैचमेंट बनाए हुए हैं, जिससे ज़मीनी सेवाओं पर गहरा असर पड़ा है। सवाल यह है कि इन कर्मचारियों को संरक्षण कौन दे रहा है? क्या विभागीय प्रमुख, ब्लॉक स्तर के अधिकारी या राजनीतिक प्रभाव इसमें भूमिका निभा रहे हैं? यदि समय रहते इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो न केवल ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था बल्कि अन्य सरकारी सेवाओं की साख भी खत्म हो जाएगी। शासन को अब न केवल आदेश जारी करने, बल्कि उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करने पर ध्यान देना होगा।



