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बीजापुर में काष्ठ कटाई को लेकर फैले भ्रम पर वन विभाग का स्पष्ट बयान, पेशा कानून में विभाग को परामर्श का जिक्र

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The Forest Department issues a clear statement regarding the confusion surrounding timber felling in Bijapur, clarifying that the law mentions the department’s role in providing consultation.

पेद्दाकोडेपाल, मुदवेंडी कावडगांव व अन्य कूप में नियमों के तहत हो रही कटाई – डीएफओ

Ro.No - 13672/156

बीजापुर@राचन्द्रम एरोला – जिले के पेद्दाकोडेपाल, मुदवेंडी व अन्य कूप क्षेत्रों में काष्ठ कटाई को लेकर बने विवाद और ग्रामीणों में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए वन विभाग ने मीडिया के माध्यम से प्रेस वार्ता आयोजित कर स्थिति स्पष्ट की। यह प्रेस वार्ता जिला मुख्यालय स्थित डीएफओ कार्यालय में हुई, जिसमें वनमंडल सामान्य बीजापुर के डीएफओ रंगानाधा रामकृष्णा वाय. एवं इंद्रावती रिजर्व/इंद्रावती टाइगर रिजर्व के डीएफओ संदीप बलगा उपस्थित रहे।

डीएफओ ने स्पष्ट किया कि इन तीनों कूपों में की जा रही काष्ठ कटाई पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धति, वन नियमों और ग्राम पंचायत परामर्श के अनुसार है। केवल उन्हीं वृक्षों को चिन्हित कर काटा जा रहा है, जो वृद्ध अवस्था में पहुंच चुके हैं। पेशा कानून के तहत इस प्रकार की कटाई के लिए अलग से किसी विशेष अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती।

उन्होंने बताया कि वर्ष 1992–93 में बीजापुर क्षेत्र में लगभग 30 से 40 कूपों में काष्ठ और बांस की कटाई नियमित रूप से होती थी, लेकिन उस समय नक्सल गतिविधियों के कारण काष्ठ परिवहन में लगे ट्रकों को जलाए जाने जैसी घटनाएं सामने आईं, जिसके चलते यह कार्य करीब 32 वर्षों तक बंद रहा।

डीएफओ ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है, सुरक्षा हालात में बड़ा सुधार हुआ है और क्षेत्र में प्रशासनिक पहुंच मजबूत हुई है। यही वास्तविक और प्रमुख वजह है कि वर्षों से रुके हुए वन कार्यों को फिर से चरणबद्ध और नियंत्रित तरीके से शुरू किया गया है। फिलहाल चार कूपों में पुराने और अनुपयोगी हो चुके वृक्षों की कटाई की जा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल कटाई नहीं, बल्कि वैज्ञानिक वन प्रबंधन, वन संरक्षण, स्थानीय रोजगार सृजन और ग्राम विकास है। जो ग्रामीण कार्य करना चाहते हैं, उनके लिए प्राथमिकता के आधार पर रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है।

काष्ठ बिक्री से प्राप्त राशि का 20 प्रतिशत जेएसएम खाते में जमा किया जाएगा, जिससे गांवों में विकास कार्य, बुनियादी सुविधाएं और सामुदायिक जरूरतें पूरी की जाएंगी। साथ ही, जहां वृक्षों की कटाई हो रही है, वहां नियमानुसार पुनः रोपण और पुनर्वनीकरण भी किया जाएगा, ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे।

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