Home Blog बस्तर की माटी से निकली ‘चंदा चकोर’ ने चक्रधर समारोह की अंतिम...

बस्तर की माटी से निकली ‘चंदा चकोर’ ने चक्रधर समारोह की अंतिम संध्या में बिखेरे प्रेम और संघर्ष के रंग

0
नारायणपुर के नितारा कला केंद्र के कलाकारों ने दी प्रभावशाली प्रस्तुति, पुनर्वासित कलाकारों की कला ने जीता दर्शकों का दिल
प्रेम, परंपरा और बदलाव की कहानी बनी ‘चंदा चकोर’, बस्तर के लोकजीवन को मंच पर किया जीवंत

रायगढ़, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह की दसवीं एवं अंतिम संगीत संध्या में नारायणपुर के नितारा कला केंद्र के कलाकारों ने नाटक ‘चंदा चकोर’ की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। बस्तर के सुदूर अंचल के जीवन, लोकपरंपराओं, प्रेम और संघर्ष को केंद्र में रखी इस प्रस्तुति ने दर्शकों को भावनाओं से जोड़ दिया।

नाटक की कहानी बस्तर के एक ऐसे गांव की है, जहां आधुनिक सुविधाओं का अभाव है, लेकिन प्रकृति, परंपरा और आपसी रिश्तों से जीवन समृद्ध है। गांव का युवक चकोर अपनी मां के साथ रहता है। खेती और जंगल पर निर्भर उसका सरल जीवन तब बदल जाता है, जब पड़ोस के गांव के बाजार में उसकी मुलाकात चंदा से होती है। चंदा एक समृद्ध और पढ़े-लिखे परिवार से है। दोनों के बीच प्रेम होता है और यही प्रेम चकोर को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की ताकत देता है। नाटक का संदेश है कि प्रेम जीवन को बदलने और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की ताकत देता है। चंदा और चकोर की कहानी इसी विश्वास को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।

Ro.No - 13954/39
पुनर्वासित कलाकारों की प्रस्तुति रही खास

नाटक की खास बात यह रही कि इसमें पुनर्वासित कलाकारों ने भी अभिनय किया। हिंसा और भटकाव का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटे इन कलाकारों ने मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उनकी सहभागिता ने नाटक को संवेदनशील और प्रेरक आयाम दिया। ‘चंदा चकोर’ का लेखन एवं निर्देशन हीरा मानिकपुरी, संगीत गरिमा दिवाकर, सहायक निर्देशन अमन राय तथा मंच सज्जा एवं प्रकाश परिकल्पना अरुण भांगे ने की। नाटक में 25 कलाकारों ने मंच पर अभिनय किया, जबकि संगीत पक्ष में 5 कलाकार शामिल रहे। नाटक की अवधि लगभग 1 घंटा 10 मिनट रही।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here