अनुसूचित जनजाति के अधिकारों की रक्षा, डी-लिस्टिंग की मांग तथा दिनांक 24 मार्च 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित महत्वपूर्ण निर्णय के संदर्भ में जनजातीय सुरक्षा मंच के ईश्वर कावड़े ने कहा कि अनुसूचित जनजाति को दिया गया संवैधानिक संरक्षण किसी सामान्य प्रशासनिक सुविधा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उन ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्रदान किया गया विशेष अधिकार है, जिनके कारण जनजातीय समाज की परंपरा, पहचान, सामुदायिक व्यवस्था और भूमि-अधिकार की रक्षा के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए। अनुसूचित क्षेत्र, ग्रामसभा की शक्तियाँ, भूमि संरक्षण तथा आरक्षण की व्यवस्था का उद्देश्य जनजातीय समाज की मूल संरचना को सुरक्षित रखना है, न कि केवल प्रमाण-पत्र के आधार पर लाभ देना।
दिनांक 24 मार्च 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया कि संवैधानिक संरक्षण स्थायी व्यक्तिगत अधिकार नहीं है, बल्कि उस सामाजिक परिस्थिति से जुड़ा है जिसके कारण वह संरक्षण प्रदान किया गया था। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति उस मूल सामाजिक व्यवस्था से अलग हो जाता है जिसके आधार पर उसे विशेष दर्जा मिला था, तो उसके अधिकारों की समीक्षा की जा सकती है। यद्यपि यह निर्णय अनुसूचित जाति के संदर्भ में दिया गया, परंतु इससे यह सिद्धांत और अधिक स्पष्ट हुआ है कि किसी भी संवैधानिक श्रेणी का लाभ उसी व्यक्ति को मिलना चाहिए जो वास्तव में उस समाज की परंपरा, जीवन-पद्धति और सामाजिक संरचना का हिस्सा बना हुआ हो। यह सिद्धांत अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनजातीय पहचान केवल जन्म से नहीं बल्कि परंपरा, आस्था, सामुदायिक जीवन और सामाजिक व्यवहार से निर्धारित होती है।
जनजातीय सुरक्षा मंच ईश्वर कावड़े ने कहा कि देश के अनेक जनजातीय क्षेत्रों में लंबे समय से ईसाई धर्मांतरण की गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की जाती रही है। समाज के विभिन्न वर्गों का यह कहना है कि प्रलोभन, सहायता, दबाव या अन्य माध्यमों से कराए गए धर्मांतरण के कारण जनजातीय समाज की पारंपरिक आस्था, रीति-रिवाज और सामुदायिक जीवन प्रभावित हुआ है। ऐसे मामलों में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि जो व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय व्यवस्था से अलग जीवन जी रहा है, क्या उसे बिना किसी परीक्षण के अनुसूचित जनजाति के सभी संवैधानिक लाभ मिलते रहना चाहिए। यह विषय किसी धर्म पंथ के विरोध का नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के अधिकारों की रक्षा का विषय है।
इसी पृष्ठभूमि में अनुसूचित जनजाति की सूची की समीक्षा तथा डी-लिस्टिंग की मांग कई वर्षों से राष्ट्रीय स्तर पर उठाई जा रही है। इस मांग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुसूचित जनजाति के लिए बनाए गए संवैधानिक प्रावधानों का लाभ वास्तविक जनजातीय समाज को मिले और किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को रोका जा सके। सर्व समाज ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के 24 मार्च 2026 के निर्णय के बाद यह मांग और अधिक मजबूत हुई है कि जनजातीय दर्जे के संबंध में वास्तविक सामाजिक स्थिति का परीक्षण किया जाना चाहिए।
इस विषय पर देशभर में जनजातीय समाज के बीच व्यापक जागरूकता आई है और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संगठित आंदोलन चल रहा है। इसी क्रम में आगामी माह मई में दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा आंदोलन आयोजित किया जा रहा है, जिसमें विभिन्न राज्यों से जनजातीय समाज के प्रतिनिधि, सर्व समाज के संगठन तथा संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले नागरिक भाग लेंगे। इस आंदोलन के माध्यम से केंद्र सरकार से यह मांग की जाएगी कि अनुसूचित जनजाति के दर्जे की समीक्षा, सत्यापन तथा आवश्यक होने पर डी-लिस्टिंग के संबंध में स्पष्ट और न्यायसंगत नीति बनाई जाए, ताकि वास्तविक जनजातीय समाज की पहचान, अधिकार और सांस्कृतिक अस्तित्व सुरक्षित रह सके।
ईश्वर कावड़े ने सभी जनजातीय प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों से इस वैधानिक एवं संवैधानिक अभियान में सहयोग की अपील करते हुए कहा कि यह आंदोलन किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि अनुसूचित जनजाति के अधिकारों की रक्षा, संवैधानिक व्यवस्था की मर्यादा और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए चलाया जा रहा है।



