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बिना देखे ही श्री कृष्ण को दिल दे बैठी थी रूखमणी – पंडित अरुण द्विवेदी

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प्रमोद अवस्थी मस्तूरी
।पांडेय परिवार कस्तूरबा नगर बिलासपुर द्वारा शिव शंकर चंद्रकली, अशोक, अनिल, आशा, तथा आरती पांडेय की स्मृति में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में कथावाचक बिलासपुर तोरवा के पंडित अरुण कुमार द्विवेदी ने संगीत मय श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग को सुनाया। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह को एकाग्रता से सुनी। श्रीकृष्ण-रुक्मणि का वेश धारण किए बाल कलाकारों पर भारी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।

श्रद्धालुओं ने विवाह के मंगल गीत गाए। कथा के मुख्य यजमान अंजली नितेश मिश्रा, माया पुत्तन दुबे थे। प्रसंग में कथा वाचक ने कहा कि रुक्मणी विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री और साक्षात लक्ष्मी जी का अवतार थी। रुक्मणी ने जब देवर्षि नारद के मुख से श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य एवं गुणों की प्रशंसा सुनी तो रुकमणी ने मन ही मन दिल देकर श्रीकृष्ण से विवाह करने का निश्चय किया। रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था और अपनी बहन का विवाह चेदिनरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से कराना चाहता था। रुक्मणी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने एक ब्राह्मण संदेशवाहक द्वारा श्रीकृष्ण के पास अपना परिणय संदेश भिजवाया। तब श्रीकृष्ण विदर्भ देश की नगरी कुंडीनपुर पहुंचे और वहां बारात लेकर आए शिशुपाल व उसके मित्र राजाओं शाल्व, जरासंध, दंतवक्त्र, विदु रथ और पौंडरक को युद्ध में परास्त करके रुक्मणी का उनकी इच्छा से हरण कर लाए। वे द्वारिकापुरी आ ही रहे थे कि उनका मार्ग रुक्मी ने रोक लिया और कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। तब युद्ध में श्रीकृष्ण व बलराम ने रुक्मी को पराजित करके दंडित किया। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने द्वारिका में अपने संबंधियों के समक्ष रुक्मणी से विवाह किया। श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के आयोजक अंजली नितेश मिश्रा के साथ भारी संख्या में भक्त गण उपस्थित थे।

Ro.No - 13672/156

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