पुसौर
पुसौर में पिछले कई वर्शो से श्रावण माह के अंतिम सप्ताह में अंखड रामसप्ताह का आयोजन होते रहा है जिसमें एक संकल्प के साथ अंखंड दीप प्रज्वलित किया जाता है जिसे अखंड रामनाम के बिच सप्ताह भर जलाये रखना होता है। इस अखंड दीप के लिये षुद्ध घी और भगवान के विग्रह के आसपास आकर्शक बनाने की व्यवस्था पुसौर वासियों की होती है जिसमें श्रद्धालुजन बढ चढ करके हिस्सा लेते रहे हैं। ‘‘जैजैराम सीताराम राधेष्याम सीताराम‘‘ इसे महामंत्र माना जाता है जिसका सस्वर गान बाजे गाजे के साथ करने की परंपरा है जिसे पुसौर के 7 मुहल्ले के लोग अलग अलग दिन आकर अपनी अपनी पारी में आकर निर्वहन करते हैं। बच्चों से बुजुर्गो द्वारा इस महामंत्र को तोतली बोली में सुनकर आनंद उठाते हैं वहीं गाने बजाने और नाचने वाले लोग अपनी कला का प्रदर्षन करने इस महामंत्र को अपने ढंग से ढाल कर आनंद उठाते हैं और सामान्य जन जो केवल नामोच्चार में विष्वास रखते हैं वे अति आर्तस्वर में जैजैराम सीताराम राधेष्याम सीताराम गाते हैं। परंपरागत स्वर में इस महामंत्र को गाने बजाने में साधारण सा ताल मात्रा होता है जिसे कोई भी गा बजा सकता है इसमें भी आकर्शक और लोक लुभावन बनाने लोगों की गायकी, नृत्य और वादन के प्रति समर्पण को पुसौरवासी बहुत सम्मान देते रहे हैं और कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं इस सब से हटकर वो लोग भी होते हैं जो समुचे कार्यक्रम को अंजाम तक पहुंचाते हैं जो कीर्तन पार्टियों व साज सज्जा व्यवस्था में अपने को समर्पित करते हैं जिसमें कि समुचा रामसप्ताह आयोजन निर्विघ्न रूप से संपन्न होता रहा है। उल्लेखनीय कि पिछले कुछ वर्शो से रामसप्ताह के बाद झुला रथ का आयोजन कसेरा भवन परिसर में आयोजित होता रहा है जबकि इसके पुर्व भगवान को पुसौर के सभी गलियों में परिक्रमा कराया जाता था। इस झुला रथ के लिये खासकर पर्रीपारा के लोग आगे आते हैं और इसे संपन्न करते हैं।



