Home Blog डोलोमाइट खदान को लेकर पर्यावरणीय संकट गहराया: लोक सुनवाई का विरोध तेज

डोलोमाइट खदान को लेकर पर्यावरणीय संकट गहराया: लोक सुनवाई का विरोध तेज

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Environmental crisis deepens due to dolomite mine: Opposition to public hearing intensifies

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के बरमकेला ब्लॉक में छेलफोरा गांव के पास प्रस्तावित डोलोमाइट खदान ने पर्यावरण और जनजीवन पर मंडराते खतरे को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है। शुभ मिनरल्स को 1 लाख टन वार्षिक क्षमता के डोलोमाइट पत्थर के उत्खनन के लिए जनसुनवाई की अनुमति दी गई है, जो 1.683 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित है।

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लेकिन स्थानीय निवासी और पर्यावरणविद इसके खिलाफ एकजुट हो गए हैं। उनका कहना है कि पहले से मौजूद वैध-अवैध खदानों ने क्षेत्र को बुरी तरह से प्रदूषित कर दिया है, और अगर इस नई खदान को मंजूरी मिलती है, तो क्षेत्र का पर्यावरण पूरी तरह से तबाह हो जाएगा।

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट पर गंभीर सवाल

डोलोमाइट खदान के लिए तैयार की गई EIA रिपोर्ट को लेकर स्थानीय निवासियों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने गंभीर आरोप लगाए हैं।

EIA रिपोर्ट के दावे: रिपोर्ट में कहा गया है कि खदान से पर्यावरण को कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। इसमें यह भी दावा किया गया है कि इस क्षेत्र में वन्यजीव नहीं हैं और खदान से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

स्थानीय आरोप: लोगों का कहना है कि रिपोर्ट वास्तविकता से कोसों दूर है। वे इसे झूठी और भ्रामक मानते हैं। उनका कहना है कि खदान से वन्यजीवों का निवास पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और पहले से मौजूद प्रदूषण का स्तर और बढ़ जाएगा।

पर्यावरण मित्र ने मांग की है कि जनसुनवाई से पहले EIA रिपोर्ट की निष्पक्षता की जांच की जाए।

पहले से मौजूद खदानों का प्रभाव

बरमकेला क्षेत्र में पहले से बड़ी संख्या में डोलोमाइट खदानें और क्रशर संचालित हैं, जिनके दुष्प्रभाव क्षेत्र के पर्यावरण और जनजीवन पर स्पष्ट हैं:

1. वायु प्रदूषण: खदानों और ट्रकों से उड़ने वाली धूल श्वसन तंत्र की गंभीर बीमारियों का कारण बन रही है।

2. जल प्रदूषण: खनन के कारण जल स्रोत दूषित हो गए हैं, जिससे पीने के पानी की समस्या गंभीर हो गई है।

3. मृदा प्रदूषण: खनन से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई है, जिससे खेती पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

4. ध्वनि प्रदूषण: खदानों और भारी वाहनों से लगातार शोर का स्तर बढ़ गया है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर असर हो रहा है।

ग्रामीणों की चिंता: हजारों की जिंदगी पर संकट

छेलफोरा और आसपास के करीब दर्जनों गांव पहले से ही खदानों से उत्पन्न प्रदूषण की चपेट में हैं। अगर शुभ मिनरल्स को 1 लाख टन वार्षिक क्षमता की खदान संचालित करने की अनुमति मिलती है, तो:

बीमारियों का बढ़ना: क्षेत्र में सांस की बीमारियां और त्वचा संबंधी समस्याएं और बढ़ेंगी।

खेती पर असर: मिट्टी की गुणवत्ता और पानी की कमी से कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा।

जीवन स्तर पर असर: धूल और शोर प्रदूषण से ग्रामीणों का जीवन कठिन हो जाएगा।

ग्रामीणों का कहना है कि नई खदान के संचालन से उनकी परेशानियां और बढ़ जाएंगी।

एनजीटी के निर्देशों की अनदेखी

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पहले ही 12 खनन लीज और पट्टों की जांच के आदेश दिए हैं। पर्यावरण मित्र का कहना है कि शुभ मिनरल्स की जनसुनवाई आयोजित करने से पहले इन खदानों की जांच पूरी की जानी चाहिए।

क्षेत्र में पहले से संचालित खदान और क्रशर पर्यावरणीय मानकों का कितना पालन कर रहे हैं।

पौधरोपण और प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए गए कदम।

खनन से क्षेत्रीय आबादी पर पड़ने वाले प्रभाव और उसके समाधान के उपाय।

पर्यावरण मित्र ने चेतावनी दी है कि अगर बिना जांच जनसुनवाई होती है, तो वे एनजीटी में केस दर्ज करेंगे।

ग्रामीणों और पर्यावरणविदों की मांगें

1. पहले जांच: सभी खदानों और क्रशर के पर्यावरणीय प्रभाव की जांच हो।

2. ईआईए रिपोर्ट की समीक्षा: रिपोर्ट की सच्चाई और क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन किया जाए।

3. जनसुनवाई पर रोक: शुभ मिनरल्स की जनसुनवाई को रोक दिया जाए जब तक कि जांच पूरी न हो।

4. स्थायी समाधान: क्षेत्र के दीर्घकालिक पर्यावरण संरक्षण और विकास के लिए वैकल्पिक योजनाओं पर विचार किया जाए।

 जिम्मेदारी

पर्यावरणविदों का कहना है कि पर्यावरण विभाग को क्षेत्र की स्थिति का संज्ञान लेना चाहिए। अगर इस खदान को मंजूरी मिलती है, तो इसका प्रभाव न केवल पर्यावरण पर पड़ेगा, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को भी नुकसान पहुंचेगा।

18 नवंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगा, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या प्रशासन ग्रामीणों की चिंताओं को गंभीरता से लेता है या खनन कंपनी को प्राथमिकता देता है।

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