Failure of Manipur governments and divided society
कांकेर। आदिवासी कार्यकर्ता एवं भारतीय किसान यूनियन के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष संजय पंत ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पूर्वोत्तर भारत के राज्य मणिपुर में गहराते हिंसा के बादलों के बीच सरकारों की असफलता एवं विभाजित होते समाज पर समीक्षात्मक टिप्पणी की है।
किसान नेता आगे कहते हैं कि आदिवासी बाहुल्य मणिपुर राज्य में आदिवासी कुकी समाज एवं गैर आदिवासी मैतई समाज के बीच खूनी संघर्ष का मुख्य कारण प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार एवं उनका दोहन है। मणिपुर में निवासरत वहां के मूलनिवासी आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों पर कानूनी रूप से कब्जा जमाने के लिए केंद्र एवं मणिपुर में सत्ता पर बैठी भाजपा की सरकारों ने राजनीतिक षड्यंत्र रचा। इस राजनीतिक षड्यंत्र को समझकर वहां के आदिवासी जनता ने इसका प्रतिरोध किया और वर्तमान खूनी संघर्ष उसी का एक हिस्सा है। यह कोई एक दिन में या अचानक होने वाली घटना नहीं है बल्कि पूंजीवादी एवं शोषणकारी ताकतों के द्वारा आदिवासियों के जल, जंगल एवं जमीन को हडपने की एक सुनियोजित साजिश है।
मणिपुर की वर्तमान हालात अत्यंत ही चिंताजनक है और साथ ही भारतीय लोकतंत्र के सभी स्तंभों- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं पत्रकारिता जगत की कार्य प्रणाली पर सवाल भी उठाता है। धन्य है देश के वह प्रधान सेवक जो अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचने के लिए शांति दूत बनकर रूस और यूक्रेन जैसे दूसरे देशों का तो दौरा करते हैं लेकिन अपने ही देश के नागरिकों के जीवन एवं भविष्य की उन्हें कोई परवाह नहीं है। बस्तर के नक्सलवादियों को मारने के लिए पाताल लोक तक जाने का दावा करने वाले देश के गृह मंत्री को धरती लोक पर अपने देश के नागरिकों के हो रहे नरसंहार के प्रति कोई दर्द नहीं होना केंद्र सरकार की स्पष्ट असफलता को दिखाता है। अपनी असफलता को छुपाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मणिपुर राज्य में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट लगाया गया जिसने हिंसा को और बढ़ाया। केंद्र सरकार के सर्वोच्च पदों पर आसीन राजनेताओं को देश की जनता को यह बताना चाहिए कि मणिपुर राज्य का दौरा करने में किस बात का डर है। चूंकि मणिपुर राज्य की सीमा दूसरे देशों से भी लगती है इसलिए केंद्र सरकार की इस असफलता की कीमत पूरे पूर्वोत्तर भारत को भुगतनी पड़ सकती है। केंद्र सरकार की नीतियों की असफलता की सजा बस्तर का आदिवासी समाज भी भुगत रहा है जहां पुलिस-नक्सली हिंसा में अंतिम नुकसान स्थानीय आदिवासी किसान भाइयों का ही हो रहा है।
आदिवासी इस धरती के प्रथम निवासी हैं एवं प्राकृतिक संसाधनों पर सबसे पहले एवं सबसे अधिक इनका ही हक है, किंतु किसी भी पक्ष द्वारा हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। भारतीय किसान यूनियन मणिपुर में सभी पक्षों से शांति बहाली की अपील करता है। देश के सभी किसान भाइयों की तरफ से यह अपील की जाती है कि प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री स्वयं मणिपुर जाकर सभी पक्षों से बातचीत करें क्योंकि देश की राजधानी में बैठकर मणिपुर में कर्फ्यू लगाने का आदेश देने से मामले का हल नहीं निकलेगा। भारतीय किसान यूनियन मणिपुर के सभी समाजों के किसान भाइयों के साथ पूरी मजबूती के साथ खड़ा है एवं सरकार द्वारा मणिपुर राज्य में शांति बहाली के लिए असफल होने की स्थिति में उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगा।



