Before the rabbit also becomes a man-eater, it would be better if we become alert… Shiv
पुसौर / पर्यावरण सुरक्षा को लेकर नदियों की पदयात्रा, षिक्षा का अलख जगाने साक्षरता अभियान में चलाये गये अक्षर पदयात्रा, प्राचीन देव स्थलों को चिन्हांकित करने देवलासों का संकलन, पाण्डुलिपियों को पुरातत्व में षामिल करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले, षहिद नंद कुमार पटेल के गृहमंत्रि व विधायक रहे कार्यकाल में निजी पीआरओ रहे स्वतंत्र पत्रकार षिव राजपुत बिते मंगलवार को अंतिम सांस ली। पुसौर स्थित उनके आवास में इनका अंतिम संस्कार हुआ जिसमें उनके परिवार जनों के साथ साथ हरित सेवा समिति अध्यक्ष सीताराम चैहान, नगर पंचायत उपाध्यक्ष उमेष साव, पुर्व पार्शद बैकुण्ठ गुप्ता, वरिश्ठ समाज सेवी जयराम साव, पत्रकार संघ अध्यक्ष गौतम पंडा, नकुल महाणा, सुरेन्द्र जेना, लक्ष्मीनारायण चैधरी, रूपधर गुप्ता,गुलाब यादव, राधेष्याम प्रधान, बंषी चैहान, प्रेम गुप्ता, पदमनाभ प्रधान, मो. इजाज आदि उपस्थित रहे। षिव राजपुत पुसौर में वर्श 2015 से निवास कर रहे थे। 2014 में स्व. रोषन लाल अग्रवाल के विधायकी कार्यकाल में उनके अनुषंसा में बने गुरूदेव कश्यप पत्रकार भवन को लेकर इन्हौने पुसौर पत्रकार संघ की बडी तारीफ की और उस दिनों से क्षेत्रीय पत्रकारों से जुडे और धीरे धीरे समाज के प्रबुद्ध और जनप्रतिनिधियों से लगातार ताल्लुकात बढे। कहीं भी पौधरोपण का कार्य होता था वे वहां बहुत रूचि दिखाकर सहभागी बनते थे और अपने मार्गदर्षन में पुसौर क्षेत्र के कई जगहों में उन्हौने पौधे लगाने के लिये लगातार प्रयास करते रहे। इसी बीच इन्हौने आदर्ष ग्राम्यभारती के संस्थापक लक्ष्मीनारायण चैधरी, हरित सेवा समिति अध्यक्ष सीताराम चैहान सहित कुछ अन्य लोगों के साथ केलो और महानदी के संगम स्थल ग्राम तिलगी उडीसा से उद्गम स्थल पहाडलुडेक तक पदयात्रा की थी जिसमें इन्हौने पर्यावरण सुरक्षा को लेकर तरह तरह के स्लोगन के बेनर बनवाकर इस यात्रा को प्रारंभ किया था। तात्कालीन समय में कल कारखानों को बसाने में सरकार द्वारा जंगलों की कटाई भी की जा रही थी इस तथ्य के मद्देनजर इनका एक स्लोगन था ‘‘ इससे पहले कि खरगोष भी आदमखोर हो जाये हम चेत जाये ंतो बेहत्तर। मतलब साफ था कि जिस गति से पर्यावरण का दोहन हो रहा है उसमें खरगोष जो कि षाकाहारी है वह पेट की भुख मिटाने मांसाहारी भी हो सकता है जो षहर की आयेगा और लोगों का षिकार करेगा। इनके सानिध्य में कुछ तथ्य इस तरह छन के आये है जिसमें ये जब 10 12 साल के उम्र में थे तो अकेले ही तालाब में नहाना, पेड पौधों के बीच घुमना इनका रूचि था जो इनके आखिरी सांस तक रही और इसलिये कुछ दिन पहले ही इन्हौने सीताराम चैहान के साथ नदियों के संगम स्थल पहुंचे थे। ये तो तय है कि इनका प्रकृति तत्व पर विषेश लगाव रहा, आते जाते कहीं पुराना पेड मिल जाता था तो ये रूक कर उसे आलिंगन करते वहीं जब नदी का सामना होता था नदी की ओर हाथ फैलाते हुये आराधना करते। जिला कलेक्टर रहे कटियार के कार्यकाल में प्रकाषित पुस्तक में इनके लिखे कई पर्यावरण संबंधी जानकारी प्रकाष में आया है वहीं कालेज के विद्यार्थी, षोधकर्ता आदि लोग नदी व पर्यावरण को लेकर इनसे मिलते रहे हैं और इनसे रूबरू होकर अपने तथ्य जुटाते हैं चूंकि पुस्तकों में लिखे गये तथ्य उसके प्रेक्टीकल होने पर वह अलग जाते हैं। बहरहाल प्रदेष स्तर के पत्रकार एवं इनसे जुडे लोग इनके निधन को लेकर अपनी अपनी मंतव्य साझा कर संवेदना व्यक्त कर रहे हैं।



