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अवैध धर्मांतरण और आदिवासी परंपरा से टकराव के आरोपी को ‘पीड़ित’ बताने की कोशिश — कांकेर में झूठे नरेटिव पर गंभीर सवाल”

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Attempt to portray the accused of illegal conversion and conflict with tribal traditions as a ‘victim’ — Serious questions raised about the false narrative in Kanker.

उत्तर बस्तर कांकेर के ग्राम बड़े तेवड़ा, तहसील आमाबेड़ा में पूर्व में घटित हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि वह मसीही समाज के कुछ तत्वों एवं राजमन सलाम द्वारा की गई एक पूर्व-नियोजित और सुनियोजित कार्रवाई थी, जिसका सीधा उद्देश्य ग्राम की आदिवासी परंपरा, सामाजिक संतुलन और सामूहिक ग्राम व्यवस्था को कमजोर करना था। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र की शांति, कानून-व्यवस्था और आपसी सौहार्द को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जिसकी छाया आज भी गांव और आसपास के क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
यह एक स्थापित तथ्य है कि उक्त क्षेत्र में विगत वर्षों से अवैध धर्मांतरण की गतिविधियाँ संचालित की जा रही थीं, जिनका स्थानीय आदिवासी समाज द्वारा लगातार विरोध किया जाता रहा है। ग्राम सभा की अनुमति के बिना धार्मिक गतिविधियाँ, परंपरागत रीति-रिवाजों की अवहेलना तथा सामाजिक दबाव के माध्यम से मतांतरण के प्रयास किए गए। जब आदिवासी समाज ने अपनी परंपरा, ग्राम मर्यादा और सामाजिक संरचना की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से आपत्ति दर्ज की, उसी पृष्ठभूमि में तनाव उत्पन्न हुआ और हिंसा को अंजाम दिया गया।
अवैध धर्मांतरण की वास्तविकता तब और अधिक उजागर हुई, जब बड़ी संख्या में आदिवासी परिवारों ने स्वेच्छा से अपने मूल धर्म, संस्कृति और परंपराओं में वापसी की। यह घर-वापसी किसी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि अवैध मतांतरण से उत्पन्न सामाजिक-सांस्कृतिक असंतोष की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। इसी कारण अवैध धर्मांतरण से जुड़े तत्वों के लिए यह वापसी असहनीय बनी और उसी हताशा में टकराव एवं हिंसा को बढ़ावा दिया गया।
इसी पृष्ठभूमि में यह अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है कि दिनांक 17 जनवरी को कांकेर हाईवे के समीप लगभग 200 लोगों को एकत्र कर एक तथाकथित “जन-संवाद बैठक” आयोजित किए जाने की घोषणा की गई है, जिसमें राजमन सलाम और उनके परिजनों—जो स्वयं पूर्व घटनाक्रम के केंद्र में रहे हैं—को “पीड़ित” के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी की जा रही है। इस आयोजन को राजनीतिक संरक्षण देकर एक सुनियोजित नरेटिव गढ़ने का प्रयास प्रतीत होता है, ताकि अवैध धर्मांतरण, घर-वापसी और पूर्व-नियोजित हिंसा के वास्तविक कारणों से ध्यान हटाया जा सके।
यह निर्विवाद है कि राजमन सलाम का नाम अवैधानिक शवदफन, ग्राम सभा की अवहेलना, धार्मिक उकसावे और आदिवासी परंपराओं को तोड़ने वाले कृत्यों से सीधे तौर पर जुड़ा रहा है। ऐसे व्यक्ति को “पीड़ित” बताना न केवल तथ्यों का विकृतिकरण है, बल्कि यह संदेश देने का प्रयास भी है कि अवैध धर्मांतरण का विरोध करने वाला आदिवासी समाज अपराधी है और परंपरा तोड़ने वाला व्यक्ति पीड़ित।
आदिवासी समाज की आपत्ति कभी किसी धर्म के विरुद्ध नहीं रही, बल्कि अवैध धर्मांतरण, ग्राम व्यवस्था के उल्लंघन और सामाजिक संतुलन को तोड़ने के विरुद्ध रही है। इसके बावजूद, अब एक संगठित प्रयास के तहत उसी समाज की सांस्कृतिक चेतना और मूल धर्म में वापसी को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो आदिवासी अस्मिता और आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है।
यह क्षेत्र संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत संरक्षित आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहाँ ग्राम सभा सर्वोच्च है और आदिवासी परंपराओं का संरक्षण राज्य का संवैधानिक दायित्व है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में अवैध धर्मांतरण से जुड़े व्यक्ति को केंद्र में रखकर भीड़ एकत्र करना, भावनात्मक एवं धार्मिक उकसावे के माध्यम से माहौल बनाना तथा उसे “पीड़ित” घोषित करना, पुनः हिंसा, सामुदायिक टकराव और जान-माल के नुकसान की वास्तविक एवं आसन्न आशंका को जन्म देता है।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर ग्राम बड़े तेवड़ा एवं आसपास के क्षेत्र के सर्वसमाज द्वारा एकजुट होकर जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा गया है, जिसमें अवैध धर्मांतरण, आदिवासी परंपरा के उल्लंघन, पूर्व-नियोजित हिंसा तथा आरोपी को “पीड़ित” बताकर झूठा नरेटिव गढ़े जाने पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई गई है। ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि यह विषय किसी एक समाज का नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक शांति, आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक व्यवस्था से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।
यह तथाकथित जन-संवाद वास्तव में संवाद नहीं, बल्कि अवैध धर्मांतरण की सच्चाई, घर-वापसी की वास्तविकता और पूर्व-नियोजित हिंसा के तथ्यों पर पर्दा डालने का प्रयास प्रतीत होता है। इसके माध्यम से प्रशासन पर दबाव बनाकर दोषियों को नैतिक संरक्षण देने और आदिवासी समाज को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है।
इन समस्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए जिला प्रशासन से यह मांग की गई है कि क्षेत्र की संवेदनशीलता, अवैध धर्मांतरण की पृष्ठभूमि, मूल धर्म में हुई व्यापक वापसी, पूर्व-नियोजित हिंसा का इतिहास तथा जान-माल की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उक्त प्रस्तावित सभा की अनुमति तत्काल निरस्त की जाए तथा आरोपी व्यक्ति को “पीड़ित” बताकर भीड़ एकत्र करने की किसी भी गतिविधि पर सख्त निवारक एवं प्रतिबंधात्मक आदेश पारित किए जाएँ।
यह वक्तव्य किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की अस्मिता, परंपरा, मूल सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए है। यदि अवैध धर्मांतरण और झूठे पीड़ित-नरेटिव को समय रहते नहीं रोका गया, तो इसके दुष्परिणामों की संपूर्ण जिम्मेदारी नरेटिव गढ़ने वालों पर ही होगी।

Ro.No - 13672/156

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