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बस्तर में शिक्षा नहीं, आदेशों का बोझ — ठंड से जूझे बच्चे, कागजों में उलझे शिक्षक, मौन साधे अधिकारी

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बीजापुर@रामचन्द्रम एरोला – बस्तर सहित बीजापुर जिले के पोटा केबिनों की 2025–26 सत्र की तस्वीर केवल बच्चों की ठंड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस पूरे तंत्र को उजागर करती है जहाँ शिक्षा से ज्यादा महत्व कागजों, पोर्टलों और आदेशों को दिया जा रहा है। जिले के लगभग 31 पोटा केबिनों में पढ़ने वाले लगभग 12 से 13 हजार आदिवासी छात्र-छात्राओं को जहां पूरे शीतकाल में शासन से गर्म कपड़े नहीं मिल सके, वहीं दूसरी ओर शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के बजाय दस्तावेजों की दौड़ में उलझाए गए। सूत्रों के अनुसार पोटा केबिनों और आश्रम-शालाओं में कार्यरत शिक्षकों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे बच्चों का आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेजों हर हाल में अपडेट कराएं। कई बच्चे दूरस्थ और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से आते हैं, जहां आज भी जन्म प्रमाण पत्र या आधार बनवाना आसान नहीं है। इसके बावजूद शिक्षकों को लक्ष्य दिए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि “प्रोग्रेस चाहिए।”
हकीकत यह है कि जिन विभागों का काम दस्तावेज़ बनाना है, वे जमीन पर सक्रिय नजर नहीं आते, लेकिन उनकी कमी का बोझ शिक्षकों के कंधों पर डाल दिया गया है। सूत्र यह भी बताते हैं कि कुछ अन्य विभागीय अधिकारियों का रवैया इतना कठोर है कि वे शिक्षकों से गाली-गलौच तक करने से नहीं चूकते। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारी या तो मौन हैं या अनदेखी कर रहे हैं।
ऐसे हालात में शिक्षक खुद को दो पाटों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। एक ओर उनसे कहा जा रहा है कि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाई जाए, बच्चों का भविष्य संवारा जाए, वहीं दूसरी ओर रोज नए आदेश, रिपोर्ट, पोर्टल अपडेट और प्रोग्रेस रिपोर्ट थमा दी जाती है। सवाल यह उठता है कि जब शिक्षक बच्चों को पढ़ाएंगे नहीं, तो गुणवत्ता कैसे बढ़ेगी? वर्तमान में 90 प्रतिशत हर स्कूल के बोर्ड परीक्षाओं में आना जरूरी जब पढ़ाएं ही नहीं तो यहां कैसे मुमकिन होगा सवाल बना।

ठंड में बिना गर्म कपड़ों के पढ़ने को मजबूर बच्चे, और दूसरी तरफ कागजों में उलझे शिक्षक — बीजापुर की यह तस्वीर तक सीमित नहीं पूरे बस्तर का यही हाल सरकारी दावों पर करारा तमाचा है। मंचों से पोटा केबिनों को बेहतर सुविधा और आदर्श शिक्षा व्यवस्था बताया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न बच्चों की बुनियादी जरूरतें समय पर पूरी हो पा रही हैं, न ही शिक्षकों को सम्मानजनक कार्य वातावरण मिल रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है— शिक्षक बच्चों को पढ़ाएं या अधिकारियों के आदेशों का पालन करें? और क्या बीजापुर में शिक्षा की गुणवत्ता यूँ ही फाइलों और फरमानों के नीचे दबती रहेगी?

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ये बताया वजह

जेम पोर्टल में रजिस्ट्रेशन नहीं होने से खरीदी नहीं , अब 2025-2026 में बच्चों की स्थिति बांसनूमा बने आवासीय विद्यालयों में रहकर पढ़ने वाले ठंड में कैसे काट रहे दिन , ना किसी नेता को फर्क पड़ रहा है ना जिम्मेदार प्रदेश के अधिकारियों को, क्या बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने पैसों की कमी या कोई चाहता ही नहीं आदिवासी बच्चों को ठण्ड से निजात मिले, ये सवाल बना।

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