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नाबालिग बेटी के मामले में चिल्फी थाना बना ‘समझौता’ का अड्डा? कथित राजीनामा पर उठे सवाल,

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पीड़िता की मां ने हस्ताक्षर से किया इनकार चिल्फी थाना प्रभारी की कार्यप्रणाली पर जांच की मांग

मुंगेली जिला से हरजीत भास्कर की रिपोर्ट 

मुंगेली/लोरमी। मुंगेली जिले के चिल्फी थाना की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। नाबालिग लड़की के कथित अपहरण एवं दुष्कर्म से जुड़े मामले में थाना स्तर पर कथित रूप से आपसी राजीनामा कराए जाने का दस्तावेज सामने आने के बाद पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले ने तब और तूल पकड़ लिया, जब पीड़िता की मां गायत्री लहरे ने दावा किया कि कथित राजीनामा आवेदन पर किए गए हस्ताक्षर उनके नहीं हैं।

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प्राप्त दस्तावेज के अनुसार, थाना प्रभारी के नाम दिए गए एक आवेदन में शिकायत वापस लेने का उल्लेख किया गया है। आवेदन में लिखा गया है कि शिकायतकर्ता अब कोई कार्रवाई नहीं चाहती तथा लड़की अपनी इच्छा से युवक के साथ गई थी। दस्तावेज पर कई लोगों के हस्ताक्षर भी दर्ज हैं।

लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद पीड़िता की मां के दावे को लेकर खड़ा हुआ है। गायत्री लहरे का कहना है कि वह पढ़ी-लिखी नहीं हैं और हमेशा अंगूठा लगाती हैं। उन्होंने कभी हस्ताक्षर नहीं किए। उनका आरोप है कि यदि वह अंगूठा लगाती हैं, तो कथित राजीनामा आवेदन पर हस्ताक्षर किसने किए और किस आधार पर शिकायत वापस लेने का उल्लेख किया गया? यह प्रश्न पूरे मामले की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।

यदि यह दावा सही पाया जाता है, तो यह केवल एक राजीनामे का मामला नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी अभिलेख में दर्ज दस्तावेज की प्रामाणिकता और पुलिस प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। ऐसे में हस्ताक्षरों की जांच, दस्तावेज की वैधता और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच आवश्यक हो जाती है।

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि यह प्रकरण वास्तव में नाबालिग लड़की से जुड़ा था और उसमें पॉक्सो (POCSO) अधिनियम अथवा अपहरण जैसे गंभीर अपराधों के प्रावधान लागू थे, तो क्या ऐसे मामले में थाना स्तर पर आपसी राजीनामा कराया जा सकता है? कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पॉक्सो जैसे मामलों में अपराध राज्य के विरुद्ध माना जाता है और केवल आपसी समझौते के आधार पर कार्रवाई समाप्त नहीं की जा सकती।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कथित राजीनामा थाना प्रभारी रघुवीर चंद्र एवं थाना स्टाफ की मौजूदगी में कराया गया। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न होगा। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही हो सकेगी।

पूरा मामला अब कई अहम सवाल खड़े कर रहा है

– यदि शिकायतकर्ता अंगूठा लगाती हैं, तो आवेदन पर हस्ताक्षर किसके हैं?

– क्या कथित राजीनामा स्वेच्छा से कराया गया था?

– क्या नाबालिग से जुड़े मामले में कानून के अनुरूप कार्रवाई की गई?

– क्या पॉक्सो अधिनियम के सभी प्रावधानों का पालन किया गया?

– क्या पूरे मामले की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी गई थी?

पत्रकारिता की दृष्टि से यह मामला केवल पुलिस की कार्यप्रणाली का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में आम नागरिक के विश्वास का भी है। यदि किसी अशिक्षित महिला के नाम से हस्ताक्षरयुक्त आवेदन तैयार हुआ है और वह स्वयं उन हस्ताक्षरों से इनकार कर रही है, तो यह स्वतंत्र, निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच की मांग करता है। ऐसे मामलों में हस्तलेखन विशेषज्ञ की जांच, संबंधित पुलिस अधिकारियों के बयान तथा सभी अभिलेखों का परीक्षण आवश्यक है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषी पाए जाने पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो।

इस संबंध में थाना प्रभारी चिल्फी रघुवीर चंद्र से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा |

👉 यह समाचार उपलब्ध दस्तावेजों एवं संबंधित पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि एवं सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांच किया जाना शेष है।)

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