जांजगीर चांपा।होली ही एक ऐसा पर्व है जो बिना किसी खर्च के पूर्ण उत्साह और उल्लास से मनाया जा सकता है। यह पकवानों का भी पर्व है। होली प्रेम-प्रतीति का, एकता और भाई-चारे का, मानवता, सौहार्द और अपनेपन का पर्व है। होली पर सभी भेदभाव भुलाकर, गले मिल कर प्रेम बांटना चाहिए। दूसरे की भावना का ध्यान रख कर थोड़ा सा रंग लगाने से घर-परिवार और समाज में शांति और सोहार्द बना रहता है यह कहना है क्षेत्र के प्रबुध्द समाजसेवी ठा ०श्रवण सिंह का जिनका मानना है की प्रेम बांटना और प्रेम देना ही वास्तव मे होली त्यौहार का मुख्य आधार है
होली पारस्परिक प्रेम का प्रतीक है। यही कारण है मथुरा और बरसाने की होली विश्व में विख्यात है। होली में थोड़े से गुलाल की और ढेर सारे प्यार की, स्नेह की, अपनेपन की, शालीनता और मर्यादा की आवश्यकता है। होली ऊंच- नीच की खाई पाट देती है। भेद-मतभेद मिटा देती है। टूटते रिश्ते भी होली में जुड़ जाते हैं। होली का संदेश भी है कि हमें प्रेम बांटना है और प्रेम ही पाना है।भारत भूमि के संस्कार वास्तव में एक ऐसी अनमोल विरासत है, जो सदियों से एक परंपरा के रूप में प्रचलित है। जो समाज में ऐक्य भाव की स्थापना करने का मार्ग प्रशस्त करता है। वर्तमान में जहां परिवार टूट रहे हैं, वहीं समाज में अलगाव की भावना भी विकसित होती जा रही है। इस भाव को समाप्त करने के लिए हमारे त्यौहार हर वर्ष पथ प्रदर्शक बनकर आते हैं, लेकिन विसंगति यह है कि हम इन त्यौहारों को भूलते जा रहे हैं। त्यौहार की परिपाटी को हमने अपनी सुविधा के अनुसार बदल दिया है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि हम अपनी जड़ों से या तो कट चुके हैं या फिर कटने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। जो व्यक्ति या समाज अपनी जड़ों से कट जाता है वह निश्चित ही पतन की ओर ही जाता है। इसलिए आइए होली के इस पर्व मे एक दूसरे से बैर मिटाकर सदभावो की क्यारी को स्नेह की वारी से भिगने दे



