मुंगेली जिला से हरजीत भास्कर की रिपोर्ट
मुंगेली। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धज्जियां उड़ाने का मामला एक बार फिर सामने आया है। छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग ने मुंगेली जिला के मुंगेली ब्लॉक स्थित तीन ग्राम पंचायतों—बीजातराई, सेतगंगा और फरहदा—के जनसूचना अधिकारियों को कड़ा नोटिस जारी करते हुए जवाब-तलब किया है।
आयोग ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि समय पर जवाब नहीं दिया गया, तो संबंधित अधिकारियों पर अधिनियम के तहत कड़ी कार्यवाही की जाएगी। यह मामला अपीलकर्ता हरजीत कुमार द्वारा दायर द्वितीय अपीलों से जुड़ा है, जिनमें लंबे समय से सूचना न मिलने की शिकायत की गई है।
👉 तीन-तीन मामलों में एक जैसी लापरवाही,
तीनों प्रकरणों (A/1633/2026, A/1634/2026, A/1635/2026) में चौंकाने वाली बात यह है कि आवेदनों की तारीख 2022 की है, लेकिन 2026 तक भी आवेदक को संतोषजनक जानकारी नहीं दी गई।
क्या यह महज लापरवाही है या फिर जानबूझकर जानकारी दबाने का खेल?
यह सवाल अब पूरे प्रशासन पर खड़ा हो गया है।
👉 आयोग का सख्त रुख,
राज्य सूचना आयोग ने अपने आदेश में कहा है कि:
जनसूचना अधिकारी 30 दिनों के भीतर कंडिकावार जवाब दें
जवाब की प्रति अपीलकर्ता को भी भेजना अनिवार्य होगा
यदि वर्तमान अधिकारी उस समय पदस्थ नहीं थे, तो तत्कालीन अधिकारी की जिम्मेदारी तय की जाए
सुनवाई में सभी दस्तावेज और प्रमाण के साथ उपस्थित होना होगा
आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि आदेश की अवहेलना करने पर दंडात्मक कार्यवाही तय है।
👉 प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल,
चार साल तक एक साधारण नागरिक को जानकारी नहीं मिलना यह दर्शाता है कि पंचायत स्तर पर सूचना का अधिकार कानून सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया है।
क्या ग्राम पंचायतों में बैठे अधिकारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं?
या फिर भ्रष्टाचार की परतें इतनी गहरी हैं कि जानकारी देने से बचा जा रहा है?
👉 वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगी सुनवाई,
इन सभी मामलों की सुनवाई 22 मई 2026 को मुंगेली जिला मुख्यालय के एनआईसी केंद्र में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से होगी। आयोग ने निर्देश दिया है कि:
अधिकारी स्वयं या अधिकृत प्रतिनिधि के साथ उपस्थित रहें
प्रतिनिधि को पूर्ण जानकारी और विधिवत प्राधिकार पत्र होना चाहिए
👉 जनता के अधिकारों के साथ खिलवाड़,
सूचना का अधिकार अधिनियम आम जनता को शासन की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखने का अधिकार देता है। लेकिन जब अधिकारी ही इस कानून को नजरअंदाज करने लगें, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है।
मुंगेली की यह घटना सिर्फ एक जिले का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करती है।
👉 अब क्या होगा आगे?,
अब सबकी नजर 22 मई की सुनवाई पर टिकी है—
क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
या फिर मामला फिर से फाइलों में दब जाएगा?
👉 (निष्कर्ष),
अगर समय रहते ऐसी लापरवाही पर सख्ती नहीं की गई, तो “सूचना का अधिकार” सिर्फ नाम का अधिकार बनकर रह जाएगा। जनता जवाब चाहती है—और इस बार जवाब देना ही होगा।



