जनसुनवाई में उठेंगे प्रदूषण, जल संकट और जनस्वास्थ्य के सवाल; बाद में पछताने से बेहतर अभी जागरूक होना

रायगढ़।
रायगढ़ शहर के पर्यावरणीय भविष्य को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण जनसुनवाई जल्द होने जा रही है। यह केवल किसी औद्योगिक परियोजना को मंजूरी देने की औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में शहर की हवा, पानी, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता तय करने वाला विषय बन चुका है। गढ़उमरिया और दर्रामुड़ा क्षेत्र में मेसर्स रुंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित एकीकृत इस्पात एवं फेरो अलॉय परियोजना के विस्तार को लेकर अब नागरिकों के बीच गंभीर चिंताएं सामने आने लगी हैं।
पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट के अनुसार यह प्रस्तावित औद्योगिक परिसर रायगढ़ शहर से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यही तथ्य सबसे अधिक चिंता का कारण माना जा रहा है, क्योंकि परियोजना में शामिल गतिविधियां सामान्य औद्योगिक इकाइयों की तुलना में कहीं अधिक बड़े पैमाने पर संचालित होंगी और उनके प्रभाव दूर-दूर तक महसूस किए जा सकते हैं।
क्या बनने जा रहा है यहां?
परियोजना दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान फेरो अलॉय इकाई का बड़े पैमाने पर विस्तार किया जाएगा। प्रस्तावित परियोजना में 2.145 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता का डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (डीआरआई) संयंत्र, 2.24 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता की स्टील मेल्टिंग शॉप, 2 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता की रोलिंग मिल, 42,900 टन प्रतिवर्ष फेरो अलॉय उत्पादन इकाई, सिंटर प्लांट, मेटल रिकवरी प्लांट, प्रोड्यूसर गैस संयंत्र तथा 50 मेगावाट क्षमता का कैप्टिव पावर प्लांट शामिल है।
वर्तमान 2.513 हेक्टेयर भूमि का विस्तार कर कुल 11.029 हेक्टेयर क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां संचालित करने की योजना है। परियोजना की अनुमानित लागत 814.5 करोड़ रुपये बताई गई है।
रोजाना 31 लाख लीटर से अधिक पानी की जरूरत
परियोजना के सबसे महत आवश्यकता के बराबर मानी जा सकती है।
ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि भविष्य में जल स्रोतों पर इसका कितना दबाव पड़ेगा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों तथा शहर की जल उपलब्धता पर इसका क्या प्रभाव होगा।
हर साल 20 लाख टन से ज्यादा कच्चा माल
प्रस्तावित संयंत्र के संचालन के लिए प्रतिवर्ष लगभग 20.1 लाख टन कच्चे माल एवं ईंधन की आवश्यकता होगी। इसमें लौह अयस्क, कोयला, डोलोमाइट, चूना पत्थर तथा अन्य औद्योगिक सामग्री शामिल हैं।
इतनी बड़ी मात्रा में कच्चे माल की आवाजाही का अर्थ है कि क्षेत्र में भारी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ेगी। इससे धूल प्रदूषण, सड़क सुरक्षा, यातायात दबाव और आसपास के गांवों व बस्तियों में जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
पहले से प्रदूषण झेल रहा है रायगढ़
रायगढ़ जिला लंबे समय से औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। तमनार, पूंजीपथरा, घरघोड़ा और धर्मजयगढ़ क्षेत्रों में संचालित उद्योगों तथा ताप विद्युत संयंत्रों को लेकर समय-समय पर प्रदूषण संबंधी शिकायतें उठती रही हैं।
ऐसे में शहर की सीमा से सटे क्षेत्र में एक और बड़े इस्पात एवं फेरो अलॉय परिसर की स्थापना को लेकर नागरिकों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। लोगों का कहना है कि जब दूरस्थ क्षेत्रों में संचालित उद्योगों के प्रभावों की चर्चा वर्षों से होती रही है, तो शहर से कुछ किलोमीटर दूर स्थापित होने वाली इस परियोजना के संभावित प्रभावों पर गंभीर और व्यापक चर्चा होना आवश्यक है।
50 मेगावाट का पावर प्लांट भी प्रस्तावित
परियोजना की कुल विद्युत आवश्यकता 62.57 मेगावाट बताई गई है। इसमें से 50 मेगावाट बिजली स्वयं परियोजना परिसर में स्थापित कैप्टिव पावर प्लांट से प्राप्त की जाएगी।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि डीआरआई, स्टील मेल्टिंग शॉप, फेरो अलॉय इकाई और पावर प्लांट जैसी गतिविधियां पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील मानी जाती हैं। इसलिए इनके संभावित प्रभावों का मूल्यांकन केवल कागजी मानकों के आधार पर नहीं बल्कि दीर्घकालिक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
जनसुनवाई क्यों है महत्वपूर्ण?
पर्यावरणीय कानूनों के तहत आयोजित होने वाली जनसुनवाई स्थानीय नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार देती है। यह वह मंच है जहां किसान, व्यापारी, विद्यार्थी, सामाजिक संगठन, पर्यावरणविद और जनप्रतिनिधि परियोजना से जुड़े सवाल, सुझाव और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि यह केवल सरकारी औपचारिकता नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल स्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन का प्रश्न है।
ये सवाल मांग रहे हैं जवाब
- क्या शहर से मात्र पांच किलोमीटर दूर इतनी बड़ी परियोजना के प्रभावों का समुचित मूल्यांकन किया गया है?
- प्रतिदिन 31 लाख लीटर से अधिक पानी की आवश्यकता का स्थानीय जल स्रोतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
- कोयला, लौह अयस्क और अन्य कच्चे माल के परिवहन से होने वाले प्रदूषण को कैसे नियंत्रित किया जाएगा?
- पावर प्लांट और स्टील इकाइयों से निकलने वाले उत्सर्जन का शहर की वायु गुणवत्ता पर क्या प्रभाव होगा?
- भविष्य में जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किस प्रकार किया गया है?
बाद में सिर्फ लकीर पीटने से कुछ हासिल नहीं होगा
रायगढ़ के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ी यह जनसुनवाई अब केवल एक औद्योगिक परियोजना की स्वीकृति भर का विषय नहीं रह गई है। यह शहर की हवा, पानी, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा सवाल बन चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी परियोजना के स्थापित हो जाने के बाद उसके प्रभावों पर बहस करने की अपेक्षा पहले से जागरूक होकर तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर चर्चा करना अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसलिए आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रायगढ़ के नागरिक, सामाजिक संगठन और आसपास के ग्रामीण इस जनसुनवाई में कितनी सक्रिय भागीदारी निभाते हैं और उनके सवालों का क्या जवाब सामने आता है।
क्योंकि आज उठाए गए प्रश्न ही आने वाले वर्षों में रायगढ़ के पर्यावरणीय भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं।



