मस्तूरी एनटीपीसी सीपत परियोजना से प्रभावित क्षेत्र के किसान वर्षों से दलदल की समस्या से जूझ रहे हैं। किसानों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से उन्हें हर साल मुआवजा प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और बार-बार आवेदन देना पड़ता है, इसके बावजूद समय पर उचित मुआवजा नहीं मिल पाता।
प्रभावित किसानों के अनुसार, वर्तमान में भी लगभग 30 किसानों का मुआवजा काट दिया गया है, जिससे उनमें भारी आक्रोश है। किसानों ने आरोप लगाया कि एनटीपीसी के अधिकारी की भूमिका संदिग्ध रही है, जो हर वर्ष किसानों को परेशान करने के साथ-साथ राजस्व अधिकारियों को भ्रमित करते हैं।
लगातार विरोध और मांग के बाद कलेक्टर के निर्देश पर आज एसडीएम और तहसीलदार मौके पर पहुंचे और दलदल प्रभावित खेतों का निरीक्षण किया। हालांकि किसानों का कहना है कि अधिकारियों ने खेतों के अंदर जाकर वास्तविक स्थिति देखने के बजाय केवल बाहर खड़े होकर ही निष्कर्ष निकाल लिया।
इसके पहले भी एनटीपीसी के अधिकारी के द्वारा जानबूझकर मार्च अप्रैल गर्मी के दिनों में खेतों का सर्वे कराया जाता है, ताकि जमीन सुखी दिखे, सवाल यह है कि क्या जून जुलाई में जो प्रभावित खेत है वह खेती करने लायक रहता है? क्या अक्टूबर नवंबर के समय में जब फसल पकने की बारी आती है तब खेत सूखा रहता है क्या उस समय खेतों में पानी नहीं रहता? और अक्टूबर नवंबर में अगर खेत
गिला रहेगा तो फसल पकेगा कैसे?
नवंबर में फसल काटने के समय जब खेत में दलदल या पानी रहेगा तो फसल काटेंगे कैसे?
किसानों ने बताया कि उनके खेत पूरी तरह बर्बाद हो चुका हैं। खेतों में किस साइड गासा है किस साइड पखारा है न हीं मेड़ की पहचान हो पा रही है। जगह-जगह गड्ढे बन गए हैं और खरपतवार इस कदर फैल चुकी है कि खेत जंगल जैसा दिखाई देने लगा है। कहीं पानी भर जाता है तो कहीं रुकता ही नहीं, जिससे खेती करना लगभग असंभव हो गया है।
एक किसान ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि उसने खेत की जुताई के लिए ट्रैक्टर बुलाया, लेकिन ट्रैक्टर खेत में फंस गया। उसे निकालने के लिए तीन अन्य ट्रैक्टर बुलाने पड़े और अतिरिक्त ₹5000 खर्च करना पड़ा।
इस दौरान भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश महामंत्री चंद्रप्रकाश सूर्या जनपद सदस्य प्रतिनिधि भास्कर पटेल ने राजस्व अधिकारियों से आग्रह किया कि सभी प्रभावित खेतों का समुचित निरीक्षण कर उन्हें पुनः खेती योग्य बनाया जाए। उन्होंने कहा कि खेतों की मेड़ बनाई जाए, खेतों में इतने बड़े-बड़े गड्ढे हो गए हैं उन गड्ढों को समतल किया जाए और खरपतवार हटाकर भूमि को उपयोगी बनाया जाए, ताकि पानी का संतुलन बना रहे। एनटीपीसी पहले की तरह उसे खेती के लायक बना कर देवें, और अगर खेती के लायक बनाकर नहीं दे पाते हैं, तो उनका मुआवजा फिक्स करें और बार-बार परेशान ना करें,
इस पर एसडीएम और तहसीलदार ने आश्वासन दिया कि वे प्रयास करेंगे कि खेतों को पुनः खेती योग्य बनाया जाए। यदि ऐसा संभव नहीं होता है, तो नियमानुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
किसानों का आरोप है कि पूर्व में भी जब मुआवजा दिया जाता था, तब भी एनटीपीसी के अधिकारी द्वारा राजस्व विभाग के माध्यम से खेतों को बार-बार कटवाया जाता रहा है, जिससे किसानों को लगातार नुकसान उठाना पड़ा।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन और एनटीपीसी इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकाल पाते हैं या फिर किसान इसी तरह हर वर्ष संघर्ष करने को मजबूर रहेंगे।



