मुंगेली/लोरमी। विकासखंड लोरमी अंतर्गत शासकीय हाईस्कूल साल्हेघोरी में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के दौरान छात्रों से शाला विकास समिति के नाम पर कथित रूप से ₹150-₹150 अतिरिक्त शुल्क वसूले जाने का मामला अब जिले में चर्चा का विषय बन गया है। छात्रों एवं अभिभावकों के शिकायतों के बाद यह मामला शिक्षा विभाग तक पहुंच गया है। इस बीच विद्यालय के प्राचार्य एल.डी. साहू का बयान सामने आने के बाद विवाद और गहरा गया है।
प्राचार्य,छात्रों एवं अभिभावकों से मिली जानकारी के अनुसार — विद्यालय में प्रवेश के दौरान कक्षा 9वीं एवं 10वीं के विद्यार्थियों से विभिन्न मदों में राशि जमा कराई गई। छात्रों का आरोप है कि प्रत्येक छात्र से शाला विकास समिति के नाम पर 150 लिए गए, लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह राशि किस मद में ली जा रही है, किस कार्य में खर्च होगी और इसकी स्वीकृति किस प्रस्ताव के आधार पर दी गई है। 9वी और 10वीं में विद्यार्थी लगभग 70 के आसपास होगे जिससे 150 रूपये के हिसाब से 10.500 रूपये वसूली की गई,
विवाद तब और बढ़ गया जब विद्यालय के प्राचार्य ने स्वयं स्वीकार किया कि वर्तमान शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शाला विकास समिति की बैठक अभी तक आयोजित नहीं हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले सत्र में 190 शुल्क का प्रस्ताव था, जबकि इस वर्ष 150 लिए गए हैं और आगामी समिति बैठक में इस राशि को प्रस्ताव में शामिल कर लिया जाएगा।
यहीं से पूरे मामले पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि वर्तमान सत्र के लिए समिति की बैठक ही नहीं हुई थी, तो छात्रों से शुल्क किस अधिकार और किस वैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया? क्या सरकारी विद्यालय में पहले राशि वसूलना और बाद में प्रस्ताव पारित करना नियमसम्मत प्रक्रिया है? यदि ऐसा किया जा सकता है, तो फिर समिति की बैठक और प्रस्ताव की व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह जाता है सरकारी विद्यालयों में यदि किसी प्रकार का शुल्क लिया जाता है तो उससे पहले समिति की बैठक, प्रस्ताव, कार्यवृत्त और शुल्क का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। इसके बाद ही अभिभावकों की जानकारी और सहमति के साथ राशि ली जानी चाहिए। उनका कहना है कि यदि पहले पैसा वसूला जाए और बाद में प्रस्ताव पारित किया जाए, तो इससे पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। किसी भी सरकारी संस्था में पहले प्रस्ताव पारित होता है, फिर निर्णय लागू किया जाता है। यदि यहां पहले वसूली और बाद में प्रस्ताव की बात कही जा रही है, तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उनका मानना है कि यदि इस प्रकार की कार्यप्रणाली को सही माना गया, तो भविष्य में कोई भी संस्था पहले राशि वसूलकर बाद में प्रस्ताव पारित करने का दावा कर सकती है।
✍️ शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का भी कहना है कि =- सामान्यतः किसी भी शासकीय विद्यालय में छात्रों से राशि लेने से पहले संबंधित समिति की बैठक, प्रस्ताव और अभिलेख तैयार होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
✍️ विद्यालय के छात्रों का कहना है कि
> “हम लोगों से एडमिशन के समय नवमी में करीब 850 और दसवीं में करीब 650 जमा कराया गया। उसमें 150 शाला विकास समिति के नाम पर लिए गए, लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह पैसा किस काम के लिए लिया जा रहा है। किसी ने हमें जानकारी नहीं दी।”
✍️प्राचार्य एल.डी. साहू का पक्ष
– मामले में जब विद्यालय के प्राचार्य एल.डी. साहू से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि —
> “पिछले सत्र में 190 शुल्क का प्रस्ताव था। इस वर्ष छात्रों से 150 लिए गए हैं। जब शाला विकास समिति की बैठक होगी, तब इस राशि को प्रस्ताव में शामिल कर लिया जाएगा।”
👉 प्राचार्य के इस बयान के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि जब समिति की बैठक नहीं हुई थी, तो शुल्क लेने का निर्णय किस आधार पर लिया गया।
✍️जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) एल.पी. डाहिरे का पक्ष-
> “शिकायत प्राप्त हुई है। पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो नियमानुसार उचित कार्रवाई की जाएगी।”
👉 इस बयान के बाद अब पूरे मामले की जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
✍️ अभिभावकों एवं स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया,-अभिभावकों एवं स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जांच में अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए तथा छात्रों से ली गई राशि वापस कराई जाए।
उन्होंने कई सवाल भी उठाए—
जब बैठक नहीं हुई थी, तो 150 लेने का आदेश किसने दिया?
क्या अभिभावकों को बैठक की सूचना दी गई थी?
क्या पालकों की सहमति ली गई थी?
राशि किस मद में खर्च होगी, इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई?
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी संस्थाओं में नियम और पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए। यदि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है, तो कार्रवाई भी उसी गंभीरता से होनी चाहिए।
अभिभावकों ने चेतावनी दी है कि यदि शिक्षा विभाग द्वारा समयबद्ध और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो वे सीएम हेल्पलाइन सहित उच्च अधिकारियों से दोबारा शिकायत करेंगे।
✍️ देखना होगा आगे क्या होता है…
अब इस पूरे मामले में निगाहें शिक्षा विभाग की जांच पर टिकी हैं। शिकायत सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने जांच का आश्वासन दिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच निष्पक्ष होगी और यदि अनियमितता सिद्ध होती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी विभागीय फाइलों में दबकर रह जाएगा?
पत्रकारिता की दृष्टि से अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए ठोस कार्रवाई करता है या फिर यह विवाद केवल आश्वासनों तक सीमित रह जाता है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट ही तय करेगी कि नियमों का पालन हुआ था या फिर सरकारी व्यवस्था में प्रक्रिया से पहले वसूली की परंपरा ने जन्म ले लिया है।



